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कोशी–मेची नदी जोड़ परियोजना: सिंचाई की उम्मीदों के बीच पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के जोखिमों का आकलन भी जरूरी

₹6,282 करोड़ की महत्वाकांक्षी परियोजना पर व्यापक विमर्श की जरूरत, भूजल पुनर्भरण, प्राकृतिक जलनिकासी, बाढ़ प्रबंधन और वैकल्पिक जलाशय मॉडल की वैज्ञानिक समीक्षा की उठी मांग

लेख: राकेश कुमार
विज्ञान शिक्षक सह पर्यावरणविद्

विकास का पैमाना केवल निर्माण नहीं, उसका दीर्घकालिक लाभ भी हो
बिहार की नदियां यहां के जीवन, कृषि, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। यही नदियां एक ओर खेतों को उपजाऊ बनाती हैं, तो दूसरी ओर मानसून के दौरान बाढ़ के रूप में बड़ी चुनौती भी प्रस्तुत करती हैं। विशेषकर सीमांचल में बाढ़, जलजमाव, सिंचाई की जरूरत और भूजल की उपलब्धता आपस में गहराई से जुड़े विषय हैं। ऐसे में जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
कोशी–मेची अंतरराज्यीय नहीं, बल्कि बिहार के भीतर संचालित होने वाली एक अंतर-बेसिन नदी जोड़ परियोजना है। इसका उद्देश्य कोशी नदी के उपलब्ध अधिशेष जल को नहर के माध्यम से महानंदा नदी बेसिन की मेची नदी तक पहुंचाना और अररिया, पूर्णिया, किशनगंज तथा कटिहार जिलों में सिंचाई सुविधा का विस्तार करना है। परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने मार्च 2025 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के तहत ₹6,282.32 करोड़ की अनुमानित लागत और ₹3,652.56 करोड़ की केंद्रीय सहायता को मंजूरी दी थी। इसे मार्च 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
निस्संदेह, सिंचाई की सुविधा बढ़ने से किसानों को लाभ मिल सकता है। लेकिन किसी भी विशाल परियोजना की सफलता का मूल्यांकन केवल निर्माण की लंबाई, बजट या प्रस्तावित सिंचाई क्षेत्र से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि परियोजना का प्राकृतिक जलचक्र, भूजल, स्थानीय नदियों, बाढ़ की निकासी, कृषि भूमि और ग्रामीण परिवारों पर दीर्घकाल में क्या प्रभाव पड़ता है।
विकास वही सार्थक है, जो किसानों की समृद्धि के साथ प्रकृति, जलस्रोतों और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।

  1. कोशी–मेची परियोजना का स्वरूप और उद्देश्य समझना जरूरी
    परियोजना की प्रस्तावित नहर व्यवस्था लगभग 117.5 किलोमीटर लंबी है। इसमें पूर्वी कोशी मुख्य नहर के शुरुआती 41.3 किलोमीटर हिस्से का पुनर्गठन और उसके आगे 76.2 किलोमीटर लंबी नई लिंक नहर का निर्माण शामिल है। सरकारी योजना के अनुसार, इसके पूरा होने पर खरीफ मौसम में लगभग 2.10 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त पूर्वी कोशी मुख्य नहर के मौजूदा कमांड क्षेत्र में सिंचाई की कमी को दूर करने का भी उद्देश्य है।
    यह परियोजना मुख्यतः सिंचाई और उपलब्ध जल के दूसरे बेसिन में उपयोग से जुड़ी है। बाढ़ के प्रभाव को कम करना इसका एक सहायक संभावित लाभ बताया गया है। इसलिए इसके मूल्यांकन में दो प्रश्नों को अलग-अलग देखना चाहिए।
    पहला, क्या परियोजना लक्षित क्षेत्रों तक भरोसेमंद और समय पर सिंचाई का पानी पहुंचा पाएगी?
    दूसरा, क्या जल स्थानांतरण से कोशी क्षेत्र में बाढ़ का जोखिम वास्तव में कितना कम होगा और महानंदा बेसिन के निचले इलाकों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
    इन दोनों प्रश्नों के उत्तर के लिए अलग-अलग जलवैज्ञानिक अध्ययन, नदी प्रवाह के आंकड़े और क्षेत्रवार विश्लेषण जरूरी हैं। सिंचाई में संभावित लाभ को स्वतः बाढ़ नियंत्रण की सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
  2. नहर के पूर्ण पक्कीकरण से भूजल पुनर्भरण पर क्या असर पड़ेगा?
    परियोजना की तकनीकी संरचना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल नहर के तल और किनारों के पक्कीकरण का है। नहरों में कंक्रीट की लाइनिंग करने से पानी का अनियंत्रित रिसाव घटता है। इससे पानी की आपूर्ति को नियंत्रित करना, नहर की स्थिरता बनाए रखना और निर्धारित मात्रा में जल पहुंचाना आसान हो सकता है।
    लेकिन दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में बिना लाइनिंग वाली नहर से रिसने वाला पानी स्थानीय भूजल भंडार को पुनर्भरित करता है, वहां पूर्ण पक्कीकरण से इस प्राकृतिक प्रक्रिया में कमी आ सकती है। इसका वास्तविक प्रभाव मिट्टी की प्रकृति, भूजल स्तर, जलभृतों की संरचना और आसपास के जलस्रोतों पर निर्भर करेगा।
    सीमांचल के ग्रामीण क्षेत्रों में चापाकल, कुएं और बोरिंग पेयजल तथा सिंचाई के महत्वपूर्ण साधन हैं। यदि किसी क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण घटता है और दूसरी ओर पानी का दोहन बढ़ता रहता है, तो जलस्तर पर दबाव बढ़ सकता है। इससे भविष्य में किसानों और ग्रामीण परिवारों की लागत बढ़ने की आशंका रहेगी।
    हालांकि यह कहना कि नहर के पक्कीकरण से पूरे क्षेत्र का भूजल स्तर निश्चित रूप से गिर जाएगा या 25 फीट पर पानी देने वाले सभी चापाकल सूख जाएंगे, बिना स्थानीय आंकड़ों के उचित नहीं होगा। इस आशंका की जांच वैज्ञानिक तरीके से होनी चाहिए।
    सुझाव: नहर के पक्कीकरण पर निर्णय लेते समय प्रत्येक क्षेत्र की मिट्टी, भूजल पुनर्भरण क्षमता और रिसाव से होने वाले लाभ-हानि का अध्ययन किया जाए। जहां तकनीकी रूप से सुरक्षित और उपयुक्त हो, वहां जियोमैट के साथ बोल्डर पिचिंग, नियंत्रित रिसाव वाले हिस्से या अन्य पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों की व्यवहार्यता जांची जा सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर जगह पक्की लाइनिंग गलत है; उद्देश्य जल संरक्षण और जल आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए।
  3. स्थानीय तापमान, हरित क्षेत्र और पारिस्थितिकी पर प्रभाव
    कंक्रीट से बनी नहरें अपने आसपास के क्षेत्र की सतह, वनस्पति और तापीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती हैं। खुले कंक्रीट की सतह पर सूर्य के विकिरण का अवशोषण, ताप का संचय, मिट्टी की नमी में बदलाव और हरित क्षेत्र में कमी स्थानीय सूक्ष्म जलवायु को प्रभावित कर सकते हैं।
    यदि नहर के दोनों किनारों पर पर्याप्त हरित पट्टी नहीं विकसित की जाती, तो कुछ स्थानों पर गर्मी का प्रभाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, स्थानीय प्रजातियों के वृक्षारोपण, घास और झाड़ियों के संरक्षण तथा प्राकृतिक जलस्रोतों को सुरक्षित रखने से पर्यावरणीय प्रभावों को कम किया जा सकता है।
    यह भी जरूरी है कि नहर में गाद जमा होने की समस्या को केवल पर्यावरणीय मुद्दा न समझकर परिचालन और आर्थिक चुनौती के रूप में देखा जाए। नियमित सफाई, तलछट प्रबंधन और संरचनाओं का रखरखाव परियोजना की दीर्घकालिक लागत का हिस्सा हैं।
    जहां तक हिमालयी ग्लेशियरों पर प्रभाव या नेपाल में बाढ़ संबंधी आपत्तियों का सवाल है, ऐसे निष्कर्षों के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं। केवल नहर के निर्माण के आधार पर ग्लेशियरों के टूटने या स्थानीय तापमान में व्यापक बदलाव होने का दावा नहीं किया जा सकता। फिर भी अंतरराष्ट्रीय नदी तंत्र, हिमालयी जलवायु और सीमा पार जल प्रबंधन से जुड़े पहलुओं का अध्ययन व्यापक जलवायु एवं पर्यावरणीय आकलन में शामिल होना चाहिए।
  4. तेरह नदी-धाराओं को पार कराने की चुनौती: बाढ़ और जलनिकासी का प्रश्न
    कोशी–मेची लिंक नहर के मार्ग में अनेक नदियां, धाराएं और छोटे जलनिकासी मार्ग पड़ते हैं। परियोजना की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट में नहर के मार्ग पर नदी-धाराओं को सुरक्षित पार कराने के लिए विभिन्न क्रॉस-ड्रेनेज संरचनाओं का प्रावधान किया गया है। इनमें 14 साइफन एक्वाडक्ट और 9 कैनाल साइफन जैसी प्रमुख संरचनाएं शामिल हैं।
    इन संरचनाओं का उद्देश्य नहर के पानी और प्राकृतिक नदी प्रवाह को तकनीकी रूप से अलग-अलग सुरक्षित रास्ते देना है। लेकिन किसी भी संरचना का वास्तविक प्रदर्शन उसके डिजाइन, निर्माण की गुणवत्ता, नदी के अधिकतम बाढ़ स्तर, तलछट की मात्रा और रखरखाव पर निर्भर करता है।
    सीमांचल में मानसून के दौरान नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। कई क्षेत्रों में बाढ़ का पानी खेतों और निचली जमीन से होकर प्राकृतिक ढाल के अनुसार बाहर निकलता है। ऐसे में नहर के तटबंध, सड़कें, पुलिया और अन्य संरचनाएं यदि स्थानीय जलनिकासी की जरूरतों के अनुरूप नहीं हों, तो कुछ क्षेत्रों में पानी के निकलने में देरी हो सकती है।
    इसके संभावित परिणाम निम्नलिखित हो सकते हैं:
    खेतों में बाढ़ का पानी लंबे समय तक जमा रहना।
    निचले इलाकों में जलजमाव की अवधि बढ़ना।
    धान और अन्य फसलों की पैदावार प्रभावित होना।
    मिट्टी की गुणवत्ता तथा कृषि कार्यों पर प्रतिकूल असर पड़ना।
    ग्रामीण सड़कों, बस्तियों और स्थानीय बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ना।
    धान की फसल भी लंबे समय तक जलभराव और पूरी तरह डूबे रहने की हर परिस्थिति को सहन नहीं कर सकती। फसल की किस्म, वृद्धि की अवस्था, पानी की गहराई और जलभराव की अवधि के आधार पर नुकसान हो सकता है। इसके अतिरिक्त, जलभराव से खेतों तक पहुंचने, कटाई और पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता में भी परेशानी हो सकती है।
    इसलिए नदी पार करने वाली प्रत्येक प्रमुख संरचना के साथ आसपास की छोटी धाराओं, खेतों और गांवों की जलनिकासी व्यवस्था का भी अध्ययन होना चाहिए। अधिकतम बाढ़ स्तर, संभावित जलभराव क्षेत्र, निकासी मार्ग और संरचनाओं की क्षमता से संबंधित आंकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
  5. साइफन में गाद जमाव और रखरखाव की वास्तविक लागत
    कोशी और उसकी सहायक नदियों के साथ गाद तथा तलछट का प्रश्न हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। नहर को पार करने वाली नदी-धाराओं में मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में तलछट आ सकती है। यदि साइफन के प्रवेश या निकास के आसपास गाद जमा होती है, तो प्रवाह क्षमता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
    हालांकि साइफन का डिजाइन, तलछट की मात्रा और सफाई की व्यवस्था यह निर्धारित करेगी कि ऐसी समस्या कितनी गंभीर होगी। यह मान लेना सही नहीं होगा कि सभी साइफन निश्चित रूप से अवरुद्ध हो जाएंगे। लेकिन ऐसी आशंका को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है।
    सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन संरचनाओं की नियमित जांच कैसे होगी, गाद निकालने की व्यवस्था क्या होगी, सफाई के लिए मशीनों और कर्मचारियों की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित की जाएगी और आपातकालीन मरम्मत पर कितना खर्च अनुमानित है।
    किसी भी बड़े जल संसाधन प्रोजेक्ट की लागत केवल निर्माण तक सीमित नहीं होती। उसके पूरे जीवनकाल में संचालन, रखरखाव और मरम्मत पर होने वाले खर्च का भी निष्पक्ष आकलन होना चाहिए।
  6. क्या 950 क्यूसेक पानी से कोशी की बाढ़ नियंत्रित हो सकेगी?
    परियोजना के अंतिम छोर पर मेची नदी में लगभग 950 क्यूसेक पानी प्रवाहित होने का उल्लेख बिहार सरकार की परियोजना संबंधी जानकारी में किया गया है।
    इसी आंकड़े के आधार पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। यदि किसी विशेष बाढ़ के दौरान कोशी का प्रवाह तीन लाख क्यूसेक तक पहुंच जाए, तो 950 क्यूसेक पानी को दूसरी नदी में स्थानांतरित करने से बाढ़ के स्तर पर कितना प्रभाव पड़ेगा?
    सिर्फ गणितीय तुलना करें तो 950 क्यूसेक, तीन लाख क्यूसेक का लगभग 0.32 प्रतिशत है। यह अंतर दिखाता है कि केवल अंतिम छोर पर बताए गए प्रवाह के आधार पर बड़े बाढ़ नियंत्रण लाभ का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
    लेकिन यहां एक जरूरी तकनीकी अंतर समझना होगा। परियोजना को केवल बाढ़ के चरम प्रवाह को कम करने वाली योजना मानना भी सही नहीं होगा। इसके आधिकारिक उद्देश्य में कोशी के उपलब्ध अधिशेष जल को सिंचाई के लिए महानंदा बेसिन तक पहुंचाना प्रमुख है। केंद्र सरकार की परियोजना विवरणी में लगभग 2,050 मिलियन घनमीटर जल के स्थानांतरण की क्षमता का उल्लेख है।
    इसलिए बाढ़ नियंत्रण संबंधी लाभों का मूल्यांकन पूरे मानसून में स्थानांतरित होने वाले जल की मात्रा, पानी छोड़ने के समय, कोशी के वास्तविक प्रवाह, बैराज की परिचालन व्यवस्था और महानंदा बेसिन की उस समय की जल ग्रहण क्षमता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
    मुख्य सवाल यह है कि परियोजना किन परिस्थितियों में, कितनी मात्रा में और किस समय पानी स्थानांतरित कर पाएगी तथा उससे बाढ़ का जोखिम कितना कम होगा?
    इसका जवाब स्वतंत्र जलवैज्ञानिक अध्ययन और अलग-अलग बाढ़ परिस्थितियों के मॉडलिंग विश्लेषण से मिलना चाहिए। इससे परियोजना के वास्तविक लाभों को लेकर अधिक पारदर्शिता आएगी।
  7. पानी कहां जाएगा और दूसरे बेसिन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
    कोशी से मेची तक पानी पहुंचाने का उद्देश्य महानंदा बेसिन में जल की उपलब्धता बढ़ाना है। इसलिए इस परियोजना का मूल्यांकन केवल कोशी क्षेत्र के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि दोनों नदी बेसिनों की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
    मानसून में पानी की उपलब्धता और बाढ़ की स्थिति हर वर्ष समान नहीं होती। किसी वर्ष अधिक अधिशेष जल उपलब्ध हो सकता है, जबकि दूसरे वर्ष कम। इसी प्रकार मेची और महानंदा बेसिन में पहले से मौजूद वर्षा, नदी प्रवाह, स्थानीय जलनिकासी और बाढ़ की परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं।
    यदि किसी समय मेची या उससे जुड़ी जलधाराओं में पहले से अधिक पानी हो, तो अतिरिक्त जल के स्थानांतरण का प्रभाव स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर जांचना जरूरी है। दूसरी ओर, पर्याप्त जल उपलब्धता के समय स्थानांतरण से सिंचाई का लाभ मिल सकता है।
    इसलिए दोनों बेसिनों के लिए जल उपलब्धता का मौसमी आकलन, पर्यावरणीय प्रवाह की जरूरत और बाढ़ के दौरान पानी छोड़ने की परिचालन नीति सार्वजनिक होनी चाहिए।
  8. कृषि भूमि, किसानों की आजीविका और वास्तविक लाभ-हानि
    कोशी–मेची परियोजना से चार जिलों में बड़े कृषि क्षेत्र को खरीफ सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद है। यदि पानी समय पर और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है, तो धान की खेती के साथ अन्य फसलों के उत्पादन और किसानों की आय को भी लाभ मिल सकता है।
    लेकिन परियोजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलेगी। यह भी देखना होगा कि नहर निर्माण के लिए कितनी भूमि प्रभावित होगी, खेतों तक पानी पहुंचाने की वितरण प्रणाली कितनी प्रभावी होगी और अतिरिक्त जल से किन क्षेत्रों में जलभराव का जोखिम बढ़ सकता है।
    किसानों के लिए पानी की उपलब्धता तभी उपयोगी है, जब उसके साथ खेतों से अतिरिक्त पानी निकालने की व्यवस्था भी हो। सिंचाई और जलनिकासी एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि खेतों में जरूरत के समय पानी उपलब्ध न हो, तो नुकसान होगा; और यदि जरूरत से अधिक पानी लंबे समय तक जमा रहे, तो भी नुकसान हो सकता है।
    इसलिए लाभार्थी क्षेत्रों के साथ संभावित रूप से प्रभावित गांवों और किसानों का भी मानचित्रण किया जाना चाहिए। जहां किसी क्षेत्र में जलनिकासी प्रभावित होने की आशंका हो, वहां निर्माण के पहले और बाद की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए।
  9. ₹6,282 करोड़ की परियोजना में आर्थिक पारदर्शिता जरूरी
    इतनी बड़ी परियोजना पर सार्वजनिक धन खर्च होने के कारण इसकी आर्थिक व्यवहार्यता का निष्पक्ष आकलन आवश्यक है। निर्माण लागत के साथ-साथ रखरखाव, गाद की सफाई, साइफन की मरम्मत, संभावित जलभराव से होने वाली कृषि क्षति और भूजल पर प्रभाव जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
    परियोजना के लाभों में अतिरिक्त सिंचाई, मौजूदा नहर के कमांड क्षेत्र में पानी की आपूर्ति बहाल करना और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग शामिल है। इन लाभों का मूल्यांकन ठोस आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
    इसी तरह, पर्यावरणीय लागत और संभावित नुकसान को भी अनुमानित लाभों के सामने रखकर देखा जाना चाहिए। यदि परियोजना के किसी हिस्से में वैकल्पिक तकनीक से समान या अधिक लाभ कम लागत पर प्राप्त किया जा सकता है, तो उस विकल्प पर विचार करना सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग की दिशा में एक सकारात्मक कदम होगा।
    यह परियोजना को रोकने या उसका विरोध करने का सवाल नहीं, बल्कि उसे अधिक प्रभावी, टिकाऊ और जवाबदेह बनाने का प्रयास होना चाहिए।
  10. क्या पोखरों और छोटे जलाशयों का नेटवर्क बेहतर विकल्प बन सकता है?
    कोशी–मेची परियोजना के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि बड़े नहर तंत्र के साथ-साथ विकेंद्रित जल संरक्षण संरचनाओं की व्यवहार्यता भी जांची जाए।
    बिहार के कई ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने पोखर, तालाब, आहर-पइन और अन्य पारंपरिक जल संरचनाएं जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। यदि उचित स्थानों पर इनका पुनर्जीवन किया जाए और जरूरत के अनुसार नए जलाशय विकसित किए जाएं, तो स्थानीय जल प्रबंधन को मजबूत किया जा सकता है।
    इस मॉडल के अंतर्गत निम्नलिखित विकल्पों पर विचार किया जा सकता है:
    पहला, स्थानीय पोखरों का पुनर्जीवन। गाद से भरे पुराने पोखरों की वैज्ञानिक सफाई, तटों की मरम्मत और जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण से उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
    दूसरा, छोटे जलाशयों का निर्माण। जहां भूमि, भूगर्भीय संरचना और जलनिकासी की स्थिति अनुकूल हो, वहां छोटे जलाशयों के समूह बनाए जा सकते हैं। इनमें मानसून के पानी को नियंत्रित तरीके से संग्रहित करने की संभावना का अध्ययन किया जा सकता है।
    तीसरा, भूजल पुनर्भरण संरचनाएं। उपयुक्त मिट्टी और जलभृतों वाले क्षेत्रों में रिचार्ज पिट, रिचार्ज तालाब और अन्य संरचनाएं विकसित की जा सकती हैं। इनके निर्माण से पहले जल गुणवत्ता और भूगर्भीय स्थिति की जांच आवश्यक होगी।
    चौथा, खेत-स्तरीय जल प्रबंधन। खेतों में मेड़बंदी, उचित निकासी नालियों और वर्षा जल संचयन की व्यवस्था से पानी का बेहतर उपयोग संभव हो सकता है।
    पांचवां, बाढ़ के पानी के लिए सुरक्षित निकासी और संग्रहण। ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां अतिरिक्त पानी को नियंत्रित तरीके से अस्थायी रूप से संग्रहित करना संभव हो, बशर्ते इससे किसी गांव, खेत या प्राकृतिक जलधारा का जोखिम न बढ़े।
    यह ध्यान रखना जरूरी है कि छोटे जलाशय अपने आप में कोशी जैसी विशाल नदी की बाढ़ का विकल्प नहीं हैं। उनकी क्षमता सीमित होती है और उन्हें उपयुक्त जलग्रहण क्षेत्र, निकासी व्यवस्था तथा रखरखाव की जरूरत होती है। इसलिए बड़े नदी तंत्र के प्रबंधन और स्थानीय जल संरक्षण को एक-दूसरे के विकल्प के बजाय पूरक उपायों के रूप में भी देखा जा सकता है।
    सरकार को विशेषज्ञ समिति के माध्यम से यह अध्ययन कराना चाहिए कि किन स्थानों पर जलाशय आधारित मॉडल प्रभावी हो सकता है और किन क्षेत्रों में मुख्य नहर की भूमिका अपरिहार्य है।
  11. जलाशयों से मत्स्य पालन, पशुपालन और ग्रामीण रोजगार
    यदि उपयुक्त जलाशयों का विकास किया जाता है, तो उनका उपयोग केवल सिंचाई या जल संचयन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। वैज्ञानिक योजना के साथ इन्हें ग्रामीण आजीविका से जोड़ा जा सकता है।
    जलाशयों में जल गुणवत्ता, गहराई और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप मत्स्य पालन विकसित किया जा सकता है। इससे मछुआरा समुदायों को रोजगार, स्थानीय बाजारों को आपूर्ति और ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आय मिल सकती है।
    उपयुक्त स्थानों पर जलाशय के किनारे बत्तख पालन, आसपास के क्षेत्रों में मुर्गी पालन और पशुपालन जैसी गतिविधियों की संभावना भी देखी जा सकती है। इसके लिए स्वच्छता, रोग नियंत्रण, पशु कल्याण और जल की गुणवत्ता से जुड़े मानकों का पालन जरूरी होगा।
    इसके अतिरिक्त मछली के बीज, पशु आहार, शीत भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन की स्थानीय व्यवस्था विकसित होने से छोटे उद्यमों को बढ़ावा मिल सकता है।
    इस तरह जल संरक्षण को ग्रामीण रोजगार और आर्थिक विकास से जोड़ने की संभावना बनती है। हालांकि इन लाभों के लिए बाजार, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
  12. हरित पट्टी और जैव विविधता संरक्षण की जरूरत
    जल संसाधन परियोजनाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण को अलग गतिविधि नहीं, बल्कि मूल योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
    नहरों के किनारे स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल देशज वृक्षों और वनस्पतियों का विकास, प्राकृतिक जलधाराओं का संरक्षण और पक्षियों तथा अन्य जीवों के आवासों को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
    इसके साथ निर्माण के दौरान मिट्टी के कटाव, गाद के अनियंत्रित बहाव, जल गुणवत्ता और आसपास की कृषि भूमि पर पड़ने वाले प्रभावों की निगरानी होनी चाहिए।
    हरित पट्टी का उद्देश्य केवल सौंदर्य बढ़ाना नहीं, बल्कि उपयुक्त स्थानों पर मिट्टी के संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी को सहयोग देना भी है। इसकी योजना स्थानीय जलवायु, मिट्टी और प्राकृतिक वनस्पति के अनुसार बनाई जानी चाहिए।
  13. परियोजना की पर्यावरणीय समीक्षा और जनभागीदारी
    इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन किया जा चुका है और केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी दी है कि 2019 में पर्यावरणीय मंजूरी दी गई
    इसलिए आगे की चर्चा का उद्देश्य पर्यावरणीय प्रक्रिया को नकारना नहीं, बल्कि निर्माण के दौरान और उसके बाद निगरानी को मजबूत करना होना चाहिए।
    परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, जल प्रवाह संबंधी आंकड़े, संरचनाओं की क्षमता, पर्यावरणीय प्रबंधन योजना और संभावित सामाजिक प्रभावों से जुड़ी जानकारी सरल भाषा में सार्वजनिक की जानी चाहिए।
    स्थानीय किसानों, पंचायत प्रतिनिधियों, मछुआरों, जल विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के साथ नियमित संवाद स्थापित किया जाना चाहिए। इससे स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ी समस्याओं को समय रहते समझने और आवश्यक सुधार करने में मदद मिलेगी।
    इसके अलावा, बाढ़ के मौसम में जलस्तर, जलनिकासी और फसल क्षति की निगरानी के लिए स्थानीय स्तर पर एक पारदर्शी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
  14. सरकार के सामने आठ महत्वपूर्ण सुझाव
    कोशी–मेची परियोजना को अधिक टिकाऊ और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
    जलवैज्ञानिक अध्ययन: कोशी और मेची बेसिन में अलग-अलग मानसूनी परिस्थितियों के अनुसार जल प्रवाह, बाढ़ और जल स्थानांतरण के प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए।
    भूजल निगरानी: नहर के निर्माण और संचालन से पहले तथा बाद में चयनित गांवों के भूजल स्तर और चापाकलों की स्थिति का नियमित रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
    प्राकृतिक जलनिकासी की सुरक्षा: नहर मार्ग में पड़ने वाली प्रमुख और छोटी धाराओं के प्रवाह को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त क्रॉस-ड्रेनेज संरचनाएं बनाई जाएं और उनकी नियमित जांच हो।
    साइफन की रखरखाव नीति: गाद निकासी, मरम्मत, निरीक्षण और आपातकालीन संचालन की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।
    पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों की समीक्षा: जहां तकनीकी रूप से संभव हो, वहां नियंत्रित रिसाव, बोल्डर पिचिंग, हरित पट्टी और अन्य उपयुक्त विकल्पों का परीक्षण किया जाए।
    वैकल्पिक जलाशय मॉडल: पोखरों, तालाबों, छोटे जलाशयों और भूजल पुनर्भरण संरचनाओं के नेटवर्क की लागत, क्षमता और लाभों की तुलनात्मक व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की जाए।
    आर्थिक लागत-लाभ विश्लेषण: निर्माण के साथ पूरे जीवनकाल के संचालन, रखरखाव और संभावित पर्यावरणीय तथा कृषि प्रभावों को भी आर्थिक मूल्यांकन में शामिल किया जाए।
    जनभागीदारी और पारदर्शिता: स्थानीय समुदायों को परियोजना की प्रगति, जल प्रबंधन नीति और पर्यावरणीय निगरानी की जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
    यदि स्वतंत्र अध्ययन यह साबित करते हैं कि परियोजना के कुछ हिस्सों में वैकल्पिक तकनीक अधिक किफायती, पर्यावरण-अनुकूल और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप है, तो संबंधित प्रावधानों में सुधार या आवश्यक संशोधन पर विचार किया जाना चाहिए।
    निष्कर्ष: पानी को संकट नहीं, समृद्धि का आधार बनाना होगा
    कोशी–मेची नदी जोड़ परियोजना बिहार के सीमांचल क्षेत्र में सिंचाई सुविधा बढ़ाने और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की एक महत्वपूर्ण पहल है। इससे किसानों को लाभ मिलने की संभावना है। लेकिन किसी भी बड़ी परियोजना की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वह अपने घोषित उद्देश्यों को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा करती है और उसके साथ जुड़े जोखिमों का प्रबंधन कितना बेहतर होता है।
    बिहार को ऐसी जल प्रबंधन नीति की जरूरत है, जो सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, प्राकृतिक जलनिकासी और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ लेकर चले। बड़ी नहरों के साथ स्थानीय पोखरों, जलाशयों, पारंपरिक जल संरचनाओं और खेत-स्तरीय जल प्रबंधन को भी उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
    ₹6,282 करोड़ जैसी बड़ी धनराशि के उपयोग में पारदर्शिता, वैज्ञानिक समीक्षा और दीर्घकालिक आर्थिक लाभ को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। परियोजना से अपेक्षित सिंचाई लाभों के साथ उसके पर्यावरणीय प्रभावों, रखरखाव की जरूरतों और स्थानीय समुदायों की चिंताओं पर भी समान गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
    मेरा स्पष्ट मत है कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच वैज्ञानिक संतुलन स्थापित किया जाए। परियोजना के लाभों को मजबूत करने, संभावित नुकसान को कम करने और वैकल्पिक उपायों की निष्पक्ष जांच करने से ही सीमांचल के किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अधिक टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।
    बाढ़ के पानी का विवेकपूर्ण प्रबंधन, सिंचाई का विस्तार, भूजल संरक्षण, मत्स्य पालन और ग्रामीण रोजगार—इन सभी को जोड़कर बिहार जल संसाधनों को आर्थिक समृद्धि का आधार बना सकता है।
    आवश्यकता केवल बड़ी संरचनाएं बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी दूरदर्शी व्यवस्था विकसित करने की है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी, उपजाऊ भूमि और सुरक्षित पर्यावरण की रक्षा कर सके।

राकेश कुमार
विज्ञान शिक्षक सह पर्यावरणविद्

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