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छह साल की आजादी का हिसाब 6 लाख रुपये से कैसे लगाएगा सिस्टम,सुप्रीम कोर्ट की यूपी पुलिस को फटकार

आगरा, उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से जुड़े एक आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने करीब छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहे अरुण उर्फ दीपक को बरी किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को 6 लाख रुपये का मुआवजा एक महीने के भीतर देने का निर्देश दिया है। तय समय में भुगतान नहीं होने पर 18 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।

26 अक्टूबर 2026 को दिए गए फैसले में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि कमजोर जांच और अभियोजन की खामियों के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। अदालत ने राज्य पुलिस को जांच प्रक्रिया के संबंध में अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की भी सलाह दी।

क्या है पूरा मामला

यह मामला अरुण उर्फ दीपक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से जुड़ा है। आगरा के अछनेरा थाने में वर्ष 2019 में दर्ज एक मामले में अरुण पर अपहरण, हत्या और सबूत मिटाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। उन्हें 14 नवंबर 2019 से हिरासत में रखा गया था।

मामले में अभियोजन की कहानी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित थी। सुनवाई के दौरान इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, कथित पहचान और जांच के दूसरे पहलुओं को लेकर गंभीर कमियां सामने आईं। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को तीन महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद मुकदमे का निपटारा हुआ और अरुण को बरी कर दिया गया।

जांच की गुणवत्ता पर अदालत ने उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जांच और अभियोजन के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताई। पीठ के अनुसार, मामले में बुनियादी जांच के कदम भी उचित तरीके से नहीं उठाए गए और कमजोर आधार पर आगे बढ़ी कार्रवाई के कारण एक व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रहना पड़ा।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस और अभियोजन एजेंसियों का उद्देश्य केवल किसी मामले में दोषसिद्धि हासिल करना नहीं होना चाहिए। उनकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना भी है कि न्याय प्रक्रिया में आरोपी समेत सभी संबंधित लोगों के अधिकारों की रक्षा हो।

डीजीपी और गृह सचिव को भेजा जाएगा आदेश

अदालत ने निर्देश दिया कि फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और राज्य के गृह सचिव को भेजी जाए। साथ ही पुलिस अधिकारियों को उचित जांच प्रक्रिया का प्रशिक्षण देने की जरूरत पर बल दिया गया, ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति से बचा जा सके।

छह साल की हिरासत के लिए छह लाख रुपये

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को अरुण को एक महीने के भीतर छह लाख रुपये देने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि तय समय में राशि का भुगतान नहीं होने पर उस पर 18 प्रतिशत सालाना ब्याज लागू होगा।

यह फैसला आपराधिक जांच की गुणवत्ता, विचाराधीन कैदियों की स्वतंत्रता और सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण सवाल सामने लाता है। अदालत की टिप्पणी का मुख्य संदेश है कि निष्पक्ष और ठोस जांच न्याय व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। <Cite

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