कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻
सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि दिव्या मित्तल राजनीति में क्या करने आ रही हैं ?
सवाल यह है कि वह बदलने क्या आई हैं—व्यवस्था या अपनी राजनीतिक हैसियत ?
क्योंकि राजनीति में बदलाव के नारे नए नहीं हैं। हर दौर में कोई न कोई चेहरा आता है, व्यवस्था की कमियां गिनाता है, जनता की बेचैनी को आवाज देता है और खुद को परिवर्तन की उम्मीद के रूप में पेश करता है। लेकिन वक्त की अदालत में नारे नहीं, नतीजे और निरंतरता टिकते हैं।
दिव्या मित्तल के सामने भी यही सबसे कठिन सवाल है—
क्या वह उन राजनीतिक तौर-तरीकों को चुनौती देने आई हैं, जिनकी आलोचना की जा रही है, या उन्हीं तौर-तरीकों के भीतर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने ?
क्योंकि व्यवस्था बदलने की कीमत होती है। उसमें सुविधा छोड़नी पड़ती है, स्थापित समीकरणों को चुनौती देनी पड़ती है और सबसे बढ़कर—अपने फैसलों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी पड़ती है।
सिर्फ यह कहना कि व्यवस्था ठीक नहीं है, पर्याप्त नहीं। सवाल यह है कि उसे ठीक करने के लिए क्या बदला जाएगा, कैसे बदला जाएगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा?
जनता अब राजनीतिक चमक-दमक से आगे देख रही है। उसे भाषण नहीं, स्पष्टता चाहिए। उसे दावे नहीं, जवाब चाहिए। और उसे ऐसे चेहरे नहीं चाहिए जो व्यवस्था की आलोचना करते हुए उसी व्यवस्था की सुविधाओं का लाभ भी उठाते रहें !
दिव्या मित्तल की राजनीति का असली इम्तिहान यहीं से शुरू होता है..
क्योंकि व्यवस्था बदलने का दावा करने वाले से जनता यह पूछने का हक रखती है—
आप व्यवस्था बदलेंगी, या व्यवस्था आपको बदल देगी ?
और अगर लक्ष्य राजनीतिक भविष्य को चार-चांद लगाना है, तो सवाल और भी असहज होगा—
फिर बदलाव का शोर किसलिए ?
राजनीति में सबसे आसान काम है खुद को विकल्प बताना। सबसे मुश्किल काम है यह साबित करना कि आप सचमुच विकल्प हैं।
अब नजर इस बात पर होगी कि दिव्या मित्तल के कदम सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने की ओर जाते हैं या व्यवस्था की दीवारों को चुनौती देने की ओर क्योंकि इतिहास भाषणों को नहीं, निर्णयों को याद रखता है। और जनता—
वह सवाल पूछना कभी बंद नहीं करती !









