लखनऊ। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस दावे पर कि प्रदेश की मतदाता सूची से 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम गायब हैं, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सवालों की झड़ी लगा दी है। उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा है कि आखिर उन्हें इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से गायब होने की जानकारी कहां से मिली और इस आंकड़े का आधार क्या है?
अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि उन्हें यह जानकारी किसने दी है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि इससे पहले चार करोड़ वोट कटने की बात कही गई थी, तो उस आंकड़े का स्रोत क्या था? सपा अध्यक्ष ने मतदाता सूची के मुद्दे पर चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए और पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग की।
क्या है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा?
दरअसल, 30 अक्टूबर को लखनऊ में आयोजित भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मतदाता सूची में बड़ी संख्या में पात्र लोगों के नाम शामिल नहीं होने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने दावा किया था कि प्रदेश में करीब 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम विधानसभा की मतदाता सूची में नहीं हैं।
मुख्यमंत्री के मुताबिक, करीब 66 लाख ऐसे लोग हैं जिनके नाम पंचायत की मतदाता सूची में दर्ज हैं, लेकिन विधानसभा की वोटर लिस्ट में नहीं हैं। इसके अलावा लगभग 55 लाख सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और 18 से 19 वर्ष आयु वर्ग के करीब 4.5 लाख युवाओं के नाम भी मतदाता सूची में नहीं होने की बात कही गई थी।
योगी आदित्यनाथ ने भाजपा के सांसदों, विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों को बूथ स्तर पर मतदाता सूची की जांच करने तथा पात्र लोगों के नाम जुड़वाने के लिए अभियान चलाने के निर्देश दिए थे। उन्होंने बूथ लेवल अधिकारियों यानी BLO के साथ समन्वय बनाकर काम करने और इसकी नियमित समीक्षा करने पर जोर दिया था।
अखिलेश यादव ने उठाया आंकड़ों की विश्वसनीयता का सवाल
मुख्यमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने पूछा कि जब प्रदेश सरकार और भाजपा के पास इतने बड़े आंकड़े हैं, तो उनका स्रोत भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री को यह स्पष्ट करना चाहिए कि 1.27 करोड़ नामों का आंकड़ा किस सर्वे, किस सूची या किस विश्लेषण के आधार पर सामने आया है।
सपा अध्यक्ष ने भाजपा और चुनाव आयोग के संबंधों को लेकर भी तंज कसा। उनका सवाल है कि मतदाता सूची में नामों की मौजूदगी और नागरिकों की पात्रता को लेकर आखिर किस आधार पर निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं। इस बयान के बाद भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच चुनावी पारदर्शिता को लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
चुनाव आयोग के आंकड़ों से कितना अलग है दावा?
इस पूरे विवाद में एक जरूरी तथ्य यह भी है कि मुख्यमंत्री के 1.27 करोड़ वाले दावे और चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान जारी आंकड़ों को एक ही बात नहीं माना जा सकता।
पुनरीक्षण के बाद जारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची से 2.04 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे, जबकि 84 लाख से ज्यादा नए मतदाता जोड़े गए। अंतिम मतदाता सूची में कुल मतदाताओं की संख्या 13,39,84,792 दर्ज की गई थी। वहीं मुख्यमंत्री का 1.27 करोड़ वाला दावा अलग-अलग मतदाता सूचियों और पात्र मतदाताओं के बीच कथित अंतर से जुड़ा है। इन दोनों आंकड़ों का सीधा अर्थ एक जैसा नहीं है।
5 नवंबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने भी कहा कि उत्तर प्रदेश में चल रहे मतदाता पंजीकरण अभियान के तहत एक करोड़ से अधिक नए मतदाताओं को जोड़ने का लक्ष्य है। उन्होंने विधानसभा मतदाता सूची और पंचायतों तथा नगरीय निकायों की मतदाता सूचियों के बीच अंतर का उल्लेख किया।
2027 से पहले वोटर लिस्ट बना बड़ा सियासी मुद्दा
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है। भाजपा जहां पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल कराने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर रही है, वहीं विपक्ष आंकड़ों की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है।
अब बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 1.27 करोड़ वाले दावे का पूरा आधार क्या है? क्या अलग-अलग मतदाता सूचियों के मिलान से यह अंतर सामने आया है या इसके पीछे कोई अन्य गणना है? अखिलेश यादव के सवालों के बीच प्रदेश की जनता और राजनीतिक दलों की निगाहें चुनाव आयोग तथा निर्वाचन अधिकारियों की ओर टिकी हैं।










