कृष्णा पंडित की कलम से ✍🏻
छापा पड़ा… हलचल मची… कार्रवाई की खबर बनी… और फिर लौट आई जुए के अड्डों पर वही रौनक
वाराणसी: अगर किसी कथित जुए के अड्डे पर कार्रवाई के बाद भी कुछ समय में गतिविधियां फिर शुरू होने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—आखिर कार्रवाई का डर गया कहां ?
कानून का शिकंजा इतना ढीला क्यों है कि कार्रवाई के बाद भी वही खेल दोबारा सिर उठा लेता है?
जनता को यह समझ नहीं आता कि छापेमारी का मकसद वास्तव में जुए पर रोक लगाना है या सिर्फ कुछ समय के लिए दिखावटी सख्ती दिखाना। क्योंकि अगर रोक स्थायी नहीं है, तो फिर बार-बार की कार्रवाई आखिर किस काम की ?
जुआ सिर्फ ताश की गड्डी और पैसों का खेल नहीं है। इसके पीछे परिवारों की आर्थिक बर्बादी, कर्ज, विवाद और सामाजिक अपराधों का खतरा भी जुड़ा हो सकता है। ऐसे में जिम्मेदार विभाग की जवाबदेही सिर्फ छापा मारने तक खत्म नहीं होनी चाहिए !
सवाल यह भी है कि यदि किसी स्थान की लगातार शिकायतें सामने आती हैं, तो उसकी निगरानी कौन करेगा ? कार्रवाई के बाद वहां दोबारा गतिविधियां शुरू हुईं तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर छापे के बाद जुआ फिर शुरू हो जाता है, तो क्या कार्रवाई कमजोर थी, निगरानी कमजोर थी या व्यवस्था में कहीं कोई बड़ी खामी है ?
जनता को कागजी कार्रवाई नहीं, जमीन पर नतीजा चाहिए..
छापेमारी की खबरें बहुत हो गईं। अब जरूरत है यह दिखाने की कि जिन जगहों पर कार्रवाई हुई, वहां दोबारा वही खेल शुरू न हो। क्योंकि—
बार-बार छापा और बार-बार जुआ शुरू—यह कानून के डर की जीत नहीं, सवालों की हार है …
✍🏻 कृष्णा पंडित..










