कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻
वाराणसी: कभी राजनीति सेवा, त्याग और जनकल्याण का माध्यम मानी जाती थी। नेता जनता की समस्याओं को अपना दर्द समझता था और समाज के लिए संघर्ष करता था। लेकिन आज राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल गया है। अब नेता “जनसेवक” कम और “अभिनेता” ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। यही कारण है कि राजनीति में दिखावा, झूठे वादे, प्रचार और स्वार्थ का जहर घुल चुका है।
आज का नेता मंच पर भाषण देता है, कैमरे के सामने आंसू बहाता है, गरीब के घर खाना खाता है, सड़क पर झाड़ू लगाता है, लेकिन यह सब केवल कैमरे की चमक तक सीमित रहता है। जनता के बीच जो अभिनय होता है, वह चुनाव खत्म होते ही गायब हो जाता है। राजनीति अब सच्चाई नहीं, बल्कि “इमेज मैनेजमेंट” का खेल बन चुकी है।
नेताओं ने अभिनय की कला इतनी अच्छी तरह सीख ली है कि असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो गया है। जनता की भावनाओं से खेलना, धर्म और जाति के नाम पर नाटक करना, चुनावी मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें करना — यह सब राजनीति का नया चेहरा बन गया है। जो जितना बड़ा अभिनेता है, वह उतना बड़ा नेता माना जा रहा है।
दुखद बात यह है कि इस अभिनय ने ईमानदार राजनीति को कमजोर कर दिया। जो व्यक्ति सच्चाई से जनता की सेवा करना चाहता है, वह भीड़ और प्रचार के शोर में दब जाता है। अब राजनीति में चरित्र नहीं, बल्कि कैमरे पर अच्छा दिखना जरूरी हो गया है।
सोशल मीडिया ने इस बीमारी को और बढ़ा दिया है। आज विकास कम और वीडियो ज्यादा बनाए जाते हैं। जनता की समस्याओं का समाधान कम होता है, लेकिन उनके नाम पर फोटोशूट और प्रचार ज्यादा होता है। सड़क टूटी रहे, अस्पतालों में दवा न मिले, बेरोजगारी बढ़ती रहे — लेकिन नेता की “इमेज” चमकती रहनी चाहिए।
राजनीति में अभिनय बढ़ने का सबसे बड़ा नुकसान जनता को हुआ है। जनता हर चुनाव में नए सपनों के जाल में फंसती है और फिर पांच साल तक ठगी जाती है। वादे मंच पर जन्म लेते हैं और सत्ता मिलते ही मर जाते हैं।
जरूरत इस बात की है कि राजनीति फिर से सेवा, ईमानदारी और जवाबदेही के रास्ते पर लौटे। जनता को भी चेहरे नहीं, चरित्र पहचानना होगा। क्योंकि जब नेता अभिनेता बन जाता है, तब राजनीति लोकतंत्र नहीं बल्कि एक “मंच” बनकर रह जाती है, जहां जनता सिर्फ दर्शक बन जाती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मीडिया भी अपना बखूबी बिचौलिया का रोल निभा रही है और नेता से अभिनेता बनने में मददगार साबित हो रही है जब खबरें प्लांट होती हैं तो नेताजी को अभिनेता बनने के लिए मीडिया सलाहकार बन जाती है और फिर दोनों मिलकर समाज को दिखावे के लिए जन सेवा का भोजन परोस अपनी दुकान चला रहे हैं ! नौटंकी इतनी बढ़ गई है कि रील बाजी से ही दुकान सजी हुई है और ग्राहक डफली बजाकर उनका स्वागत और अभिनंदन कर रहे हैं !!










