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बीएचयू में जांच कमेटी पर उठे सवाल: शिक्षकों ने निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर जताई चिंता

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में शिक्षकों के खिलाफ जांच प्रक्रिया पर बढ़ा विवाद

वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में शिक्षकों के विरुद्ध गठित जांच कमेटी को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में विवाद और असंतोष का माहौल गहराता जा रहा है। जांच कमेटी द्वारा लगातार तीसरा पत्र जारी करते हुए इसे “अंतिम अवसर” बताया गया है, जिसके बाद शिक्षकों और शैक्षणिक समुदाय के बीच निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

शिक्षकों का कहना है कि जिस तेजी और तरीके से पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है, उससे यह आशंका उत्पन्न हो रही है कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष वातावरण में संचालित नहीं हो रही है। कई शिक्षकों ने आरोप लगाया कि शिक्षकों को पर्याप्त समय और सम्मानजनक अवसर दिए बिना दबाव का माहौल तैयार किया जा रहा है।


प्रो. लखोटिया की भूमिका पर उठे सवाल

विश्वविद्यालय में चर्चा का केंद्र जांच कमेटी के अध्यक्ष प्रो. लखोटिया की भूमिका बनी हुई है। कुछ शिक्षकों का आरोप है कि प्रो. लखोटिया की कार्यशैली पहले से ही शिक्षक विरोधी मानी जाती रही है और वर्तमान परिस्थितियों में वे निष्पक्ष वातावरण बनाने के बजाय दबाव की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं।

कुछ शिक्षकों ने यह भी दावा किया कि विश्वविद्यालय परिसर में इस बात की चर्चा है कि प्रो. लखोटिया की बहू चिकित्सा अधीक्षक (एम.एस.) पद की अभ्यर्थी हैं और ऐसे में कुलपति प्रशासन को संतुष्ट करने की मंशा से जांच प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि इस विषय पर विश्वविद्यालय प्रशासन या संबंधित पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।


दूसरे सदस्य प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार को लेकर भी विवाद

जांच कमेटी के दूसरे सदस्य प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार को लेकर भी शिक्षकों के बीच चर्चाएं तेज हैं। कुछ शिक्षकों का कहना है कि वे पूर्व में विभागाध्यक्ष पद को लेकर लंबे समय तक आंदोलन और धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। साथ ही कुछ शिक्षकों ने उन पर राजनीतिक गतिविधियों और जातिगत राजनीति से जुड़े रहने के आरोप लगाए हैं।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शिक्षक समुदाय के एक वर्ग का कहना है कि ऐसी पृष्ठभूमि वाले सदस्यों से पूर्ण निष्पक्षता की उम्मीद करना कठिन प्रतीत हो रहा है।


महिला शिक्षिकाओं ने भी जताई चिंता

कुछ महिला शिक्षिकाओं ने दावा किया कि जांच कमेटी में एक भी महिला सदस्य शामिल नहीं है, जिससे वे असहज और भयग्रस्त महसूस कर रही हैं। उन्होंने मांग की कि जांच समिति में महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए ताकि महिला शिक्षकों को निष्पक्ष और सुरक्षित वातावरण मिल सके।


“अंतिम अवसर” शब्दों पर भी आपत्ति

वरिष्ठ शिक्षकों का कहना है कि “अंतिम अवसर” जैसे शब्दों का प्रयोग भय और दबाव का वातावरण बनाता है, जो किसी लोकतांत्रिक और शैक्षणिक संस्था की गरिमा के अनुरूप नहीं है। शिक्षकों ने मांग की है कि सभी पत्राचार सार्वजनिक किए जाएं और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।


प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग

शिक्षकों ने कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन से अपील की है कि जांच प्रक्रिया को राजनीतिक, व्यक्तिगत और प्रशासनिक प्रभावों से मुक्त रखा जाए। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय ज्ञान, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का केंद्र होता है और वहां भय या पक्षपात का माहौल पूरे शैक्षणिक वातावरण को प्रभावित कर सकता है।


विश्वविद्यालय प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार

अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि विश्वविद्यालय परिसर में यह मुद्दा तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है और शिक्षक समुदाय निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच प्रक्रिया की मांग पर अडिग नजर आ रहा है। 

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