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छह शताब्दियों से अटूट आस्था, अष्टमी पर कुलदेवता की शरण में जुटे स्वर्णकार बंधु

सुलतानीपुर में देवतन बाबा और बन्नी माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना व हवन

पीढ़ियां बदलीं, पर आस्था नहीं; प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु

पूर्वांचल राज्य वाराणसी (चोलापुर)।

सनातन संस्कृति में कुलदेवता और कुलदेवी की आराधना केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं, पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसी आस्था और परंपरा की अनुपम झलक नवरात्र की अष्टमी पर चोलापुर क्षेत्र के सुलतानीपुर गांव में देखने को मिली। यहां कटैया मूल के स्वर्णकार बंधुओं ने अपने कुलदेवता देवतन बाबा और कुलदेवी बन्नी माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना एवं हवन कर परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना की।

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ पूजन-हवन

दानगंज चौकी अंतर्गत ग्राम सभा सुलतानीपुर में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत सुबह आठ बजे हुई। वैदिक मंत्रोच्चार, पूजन-अर्चन और हवन के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। पूजन एवं हवन का क्रम दोपहर बाद तक चलता रहा। इस दौरान श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और कुलदेवता-कुलदेवी के चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद प्राप्त किया। आयोजन में क्षेत्र के साथ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए सैकड़ों स्वर्णकार बंधुओं की सहभागिता रही।

छह शताब्दियों से संजोई जा रही परंपरा

कटैया मूल के स्वर्णकार बंधुओं की सुलतानीपुर से जुड़ी ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख लगभग 1419 ईस्वी (हिजरी सन् 822) से मिलता है। इस लिहाज से करीब छह सौ वर्षों से यह समाज अपने कुलदेवता और कुलदेवी की आराधना की परंपरा को संजोए हुए है। प्रत्येक वर्ष दोनों नवरात्रों की अष्टमी पर बंधु एकत्रित होकर पूजा-अर्चना करते हैं। समय के साथ इस परंपरा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था और सहभागिता निरंतर बढ़ रही है।

आस्था के साथ सामाजिक एकता का संदेश

इस अवसर पर आनंद सेठ, वेद प्रकाश सेठ, अर्जुन जियालाल सेठ, आशीष सेठ, अनुज सेठ, बबलू सेठ, राजेश सेठ, अनमोल सोनी सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने कुलदेवता देवतन बाबा और कुलदेवी बन्नी माता से परिवार की सुख-समृद्धि, समाज में प्रेम-सौहार्द और लोककल्याण की कामना की।

यह आयोजन एक बार फिर संदेश दे गया कि सनातन परंपराएं केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पीढ़ियों को जोड़ने, सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने और समाज में एकता की भावना मजबूत करने का माध्यम भी हैं।

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