भारतीय मुद्रा रुपये में गिरावट का सिलसिला लगातार जारी है। शुक्रवार को विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 96 के स्तर को पार कर गया। कारोबार के दौरान रुपया 96.05 के नए लाइफटाइम लो तक फिसल गया। इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में यह 95.95 के स्तर पर बंद हुआ था।
रुपये में लगातार हो रही कमजोरी ने बाजार, निवेशकों और आम जनता की चिंताओं को बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव भारतीय करेंसी पर भारी दबाव बना रहे हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल बना बड़ी वजह
रुपये की गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें मानी जा रही हैं। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव ने ग्लोबल सप्लाई चेन को प्रभावित किया है।
ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 109 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI क्रूड करीब 105 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। तेल की कीमतों में यह तेजी वैश्विक बाजार में अस्थिरता का संकेत मानी जा रही है।
भारत पर क्यों पड़ता है सीधा असर?
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
चूंकि कच्चे तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है, इसलिए तेल आयात बढ़ने के साथ डॉलर की मांग भी बढ़ती है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ता है और भारतीय मुद्रा कमजोर होती जाती है।
कमजोर रुपया मतलब समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करना। इसका असर देश के आयात बिल, चालू खाते के घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दिखाई देता है।
आम आदमी की जेब पर असर
रुपये में गिरावट और तेल की बढ़ती कीमतों का असर सीधे आम जनता पर पड़ता है।
- पेट्रोल-डीजल और CNG महंगे हो सकते हैं
- ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है
- रोजमर्रा के सामान की कीमतों में इजाफा संभव
- आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य वस्तुएं महंगी हो सकती हैं
- महंगाई दर में और बढ़ोतरी का खतरा
आगे क्या?
विशेषज्ञों के मुताबिक यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बाजार में हस्तक्षेप और नीतिगत कदम उठा सकते हैं।
फिलहाल बाजार की नजर वैश्विक तेल कीमतों, डॉलर इंडेक्स और मध्य-पूर्व के हालात पर बनी हुई है।










