SIT के पुनर्गठन के संकेत, अदालत ने कहा— जांच को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाए
अयोध्या/नई दिल्ली | वेब डेस्क
अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि यह मामला आपराधिक जांच का है, इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने जोर दिया कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए तथा उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।
क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे, ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि उसका उद्देश्य केवल निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना है, न कि किसी राजनीतिक विवाद का हिस्सा बनना।
सरकार ने क्या बताया?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक जांच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) ने की थी और अब आगे की जांच पुलिस कर रही है। उन्होंने यह भी बताया कि जांच के दौरान कुछ गिरफ्तारियां भी की गई हैं।
SIT के पुनर्गठन पर कोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या SIT का पुनर्गठन किया जा सकता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार को इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अदालत ने संकेत दिया कि पहले से जांच कर चुके अनुभवी अधिकारियों की निगरानी में जांच आगे बढ़ाई जा सकती है ताकि निष्पक्षता बनी रहे। अगली सुनवाई 27 जुलाई को निर्धारित की गई है।
याचिकाकर्ताओं के आरोप
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दावा किया कि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए नकद दान के अलावा सोना, चांदी और अन्य कीमती वस्तुओं में भी कथित अनियमितताएं हुई हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास कुछ दस्तावेज और रसीदें हैं तथा पूरे मामले की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराई जानी चाहिए। अदालत ने फिलहाल आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की और जांच जारी रहने दी।
कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि “यह मंच राजनीति के लिए नहीं है।” सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से संयम बरतने और जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने देने की बात कही। अदालत ने दोहराया कि आगे का फैसला जांच रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।










