सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें, खराब शौचालय, टूटी छतें और बुनियादी सुविधाओं की कमी अब सिर्फ स्थानीय समस्या नहीं रह गई है। सोशल मीडिया के दौर में स्कूलों की बदहाल तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल होकर सरकारों के लिए जवाबदेही का सवाल बन रहे हैं। खासकर Gen Alpha और Gen Z के दौर में यह मुद्दा लगातार चर्चा में है।इसी बीच राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के लिए बड़े स्तर पर योजनाओं का ऐलान किया है। राजस्थान में स्कूलों के लिए 12,500 करोड़ रुपये का रोडमैप तैयार किया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश में 3,126 स्कूलों के पुनर्निर्माण और कायाकल्प पर 604 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.राजस्थान सरकार ने सरकारी स्कूलों में भवन निर्माण, अतिरिक्त कक्षों, मरम्मत और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए 12,500 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 611 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिनके पास खुद की इमारत नहीं है। वहीं, भवन वाले 64 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में भी बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं, जहां जरूरी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। स्कूलों की स्थिति को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच सरकार का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।उत्तर प्रदेश में भी सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए 604 करोड़ रुपये की योजना तैयार की गई है। इसके तहत 3,126 स्कूलों का पुनर्निर्माण और कायाकल्प किया जाएगा। जर्जर भवनों की जगह नई इमारतें तैयार करने के साथ स्कूलों की मरम्मत पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए 302 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी की जा चुकी है। इन फैसलों से साफ है कि सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकारों पर जवाबदेही का दबाव लगातार बढ़ रहा है।Gen Alpha यानी मोटे तौर पर 2010 के बाद जन्मी पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बड़ी हो रही है। ऐसे में किसी सरकारी स्कूल में टूटा पंखा, जर्जर छत, खराब शौचालय या भवन की कमी अब केवल उस इलाके तक सीमित नहीं रहती।एक तस्वीर या वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते ही कुछ ही समय में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसके बाद प्रशासन और सरकार से कार्रवाई की मांग शुरू हो जाती है।राजस्थान और यूपी में स्कूलों की बदहाली से जुड़े मामले और सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो इसी बदलते माहौल की ओर इशारा करते हैं।स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर दिल्ली में भी बड़ा कदम उठाया गया है। संरचनात्मक और इंफ्रास्ट्रक्चर ऑडिट के बाद 34 सरकारी स्कूलों की इमारतों को गिराने के लिए चिन्हित किया गया है।कुछ अन्य इमारतों को लेकर यह आकलन किया जा रहा है कि उन्हें मरम्मत की जरूरत है या फिर नए सिरे से निर्माण किया जाना चाहिए। इसके साथ ही नई सरकारी स्कूल इमारतों के निर्माण की दिशा में भी काम किया जा रहा है।इसे सीधे तौर पर सरकारों के बैकफुट पर आने के बजाय बढ़ती सार्वजनिक जवाबदेही के तौर पर देखा जा सकता है। पहले किसी गांव या कस्बे के स्कूल की खराब हालत की जानकारी अक्सर स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहती थी। अब सोशल मीडिया ने तस्वीर बदल दी है।किसी स्कूल की बदहाली का वीडियो वायरल होते ही प्रशासन से लेकर सरकार तक सवाल पहुंच जाते हैं। ऐसे में सरकारों के लिए केवल आश्वासन देना पर्याप्त नहीं रह गया है, बल्कि जमीन पर कार्रवाई दिखाना भी जरूरी हो गया है।Gen Alpha का बड़ा हिस्सा अभी मतदान की उम्र तक नहीं पहुंचा है। इसके बावजूद इस पीढ़ी से जुड़े स्कूल और शिक्षा के मुद्दे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन समस्याओं को सबसे पहले बच्चों के माता-पिता, शिक्षक और स्थानीय लोग उठाते हैं।सोशल मीडिया पर लगातार सामने आने वाली ऐसी तस्वीरें सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी छवि को प्रभावित कर सकती हैं। यही वजह है कि आज स्कूलों की स्थिति केवल शिक्षा विभाग का प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गई, बल्कि शासन और जवाबदेही से भी जुड़ गई है।राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हालिया फैसलों से संकेत मिलता है कि सरकारी स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर अब सरकारों के लिए ज्यादा गंभीर मुद्दा बन चुका है।स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने जनता को समस्याएं सामने लाने का ऐसा माध्यम दे दिया है, जहां किसी जर्जर स्कूल की तस्वीर लंबे समय तक दबाकर रखना मुश्किल है। ऐसे में Gen Z और Gen Alpha से जुड़े डिजिटल दबाव ने सरकारों की जवाबदेही बढ़ाई है।हालांकि इन फैसलों को केवल सोशल मीडिया दबाव का नतीजा कहना सही नहीं होगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि डिजिटल दौर में स्कूलों की बदहाली अब सार्वजनिक बहस और राजनीतिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
राजस्थान से यूपी तक, स्कूलों की बदहाली पर सरकारों का बड़ा एक्शन, क्या Gen Alpha का बढ़ता दबाव बना वजह?










