नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में हो रहे BRICS शिखर सम्मेलन में भू-राजनीतिक तनाव का असर साफ दिखाई दे रहा है। रूस और ईरान ने अमेरिका तथा पश्चिमी देशों की प्रतिबंधात्मक नीतियों और आर्थिक दबाव पर तीखे सवाल उठाए हैं। वहीं भारत ने BRICS को किसी देश के खिलाफ गठबंधन बनाने के बजाय वैश्विक सहयोग और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने वाला मंच बनाए रखने पर जोर दिया है। ऐसे में नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती BRICS के भीतर बढ़ते पश्चिम-विरोधी रुख और भारत के अपने पश्चिमी रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन साधने की है।
रूस का पश्चिमी दबाव पर हमला
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने BRICS के मंच से पश्चिमी आर्थिक और राजनीतिक दबाव की आलोचना की। उन्होंने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव हो रहे हैं और BRICS को आर्थिक विकास, तकनीक, बुनियादी ढांचे, भुगतान व्यवस्था और निवेश के क्षेत्र में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाना चाहिए।
पुतिन ने पश्चिमी प्रतिबंधों और व्यापारिक प्रतिबंधों को लेकर भी सवाल उठाए। रूस लंबे समय से अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और वह BRICS को पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कम करने के एक संभावित मंच के रूप में देखता है।
ईरान ने प्रतिबंधों और डॉलर निर्भरता पर उठाए सवाल
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने BRICS बिजनेस फोरम में आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि प्रतिबंधों और आर्थिक दबावों का असर केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता।
पेजेशकियन ने BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और ऐसे वित्तीय तंत्र विकसित करने की वकालत की, जिससे सदस्य देश राजनीतिक और आर्थिक दबावों से अधिक सुरक्षित रह सकें। उन्होंने BRICS के न्यू डेवलपमेंट बैंक को भी बुनियादी ढांचे और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए स्थानीय मुद्रा में वित्त उपलब्ध कराने की दिशा में मजबूत करने की बात कही।
BRICS में डी-डॉलराइजेशन की चर्चा, लेकिन भारत की राह अलग
BRICS के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा लगातार तेज हो रही है। हालांकि भारत का रुख पूरी तरह पश्चिम-विरोधी आर्थिक व्यवस्था बनाने के बजाय व्यावहारिक सहयोग पर केंद्रित है।
नई दिल्ली घोषणापत्र में सदस्य देशों ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को अधिक तेज, सुरक्षित और कम लागत वाला बनाने की दिशा में सहयोग जारी रखने पर जोर दिया है। लेकिन एक साझा BRICS मुद्रा बनाने की दिशा में कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया गया है।
मोदी का स्पष्ट संदेश—BRICS किसी के खिलाफ नहीं
भारत ने इस पूरे घटनाक्रम के बीच अपना रुख स्पष्ट रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS शिखर सम्मेलन में कहा कि BRICS किसी के खिलाफ नहीं है। उन्होंने संगठन के भीतर बनी सहमति को ठोस परिणामों में बदलने की जरूरत बताई।
मोदी ने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, ग्लोबल साउथ की अधिक भागीदारी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर जोर दिया।
नई दिल्ली घोषणापत्र ने बढ़ाई भारत की भूमिका
BRICS देशों ने शनिवार को नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से स्वीकार किया। घोषणापत्र में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताते हुए अधिकतम संयम बरतने और बातचीत, परामर्श तथा कूटनीति के जरिए विवादों का समाधान करने की अपील की गई है।
घोषणापत्र में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर भी चिंता जताई गई है। हालांकि किसी एक देश का नाम लेकर हमला करने के बजाय सदस्य देशों ने व्यापक और संतुलित भाषा का इस्तेमाल किया। यही भारत की कूटनीतिक रणनीति की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह संतुलन?
भारत के एक तरफ रूस और ईरान जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापार, तकनीक, रक्षा और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा चीन के साथ भारत के संबंध भी BRICS की राजनीति को सीधे प्रभावित करते हैं।
यही वजह है कि भारत नहीं चाहता कि BRICS केवल पश्चिम-विरोधी राजनीतिक मंच बन जाए। नई दिल्ली की कोशिश है कि संगठन को ग्लोबल साउथ, आर्थिक सहयोग, विकास, तकनीक और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए इस्तेमाल किया जाए।
रूस-ईरान बनाम अमेरिका की खींचतान में भारत की परीक्षा
BRICS में रूस और ईरान का पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ मुखर होना भारत के लिए आसान स्थिति नहीं है। भारत रूस के साथ मजबूत ऊर्जा और रणनीतिक संबंध बनाए हुए है, ईरान के साथ भी उसके महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और आर्थिक हित हैं। वहीं अमेरिका के साथ भारत के संबंध पिछले वर्षों में रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्रों में गहरे हुए हैं।
ऐसे में भारत की नीति साफ दिखाई देती है—किसी एक धड़े का हिस्सा बनने के बजाय सभी प्रमुख शक्तियों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रखना।
यही भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति की असली परीक्षा है।
नई दिल्ली से निकला बड़ा संदेश
BRICS Summit 2026 ने यह साफ कर दिया है कि संगठन अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। वैश्विक व्यापार, प्रतिबंध, भुगतान व्यवस्था, पश्चिम एशिया का संघर्ष, आतंकवाद और वैश्विक शासन व्यवस्था जैसे मुद्दे BRICS के एजेंडे का हिस्सा बन चुके हैं।
लेकिन भारत की कोशिश इस मंच को सीधे अमेरिका या पश्चिम के खिलाफ खड़ा करने के बजाय एक ऐसे मंच के रूप में बनाए रखने की है, जहां अलग-अलग विचार रखने वाले देश साझा हितों पर साथ काम कर सकें।
नई दिल्ली घोषणापत्र पर बनी सहमति इस रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा में भारत की सफलता मानी जा सकती है। अब असली चुनौती यह होगी कि BRICS के भीतर रूस और ईरान की पश्चिम-विरोधी आवाज और भारत के संतुलित रुख के बीच आने वाले समय में कितना तालमेल बनता है।










