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चंद्रशेखर से टकराव के बाद रोहिणी घावरी की सियासी एंट्री! ‘स्विट्जरलैंड टू सत्ता’ मिशन की चर्चा

लखनऊ। आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद से विवाद के बाद डॉ. रोहिणी घावरी एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। स्विट्जरलैंड से भारत लौटने के बाद उनकी गतिविधियों और बयानों ने उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, रोहिणी घावरी अब वाल्मीकि समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने की दिशा में काम करने की बात कह रही हैं। उनकी सक्रियता को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति में नए समीकरणों की संभावना के तौर पर देखा जा रहा है।

चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ लगातार मुखर

रोहिणी घावरी लंबे समय से चंद्रशेखर आजाद को लेकर सार्वजनिक रूप से गंभीर आरोप लगाती रही हैं। उन्होंने 2025 में राष्ट्रीय महिला आयोग में शिकायत देकर चंद्रशेखर पर कई आरोप लगाए थे। चंद्रशेखर आजाद ने इन आरोपों पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है, इसे भी खबर प्रकाशित करते समय अलग से शामिल करना जरूरी होगा।

हालिया बयानों में रोहिणी ने संकेत दिया है कि चंद्रशेखर के खिलाफ उनकी लड़ाई अब सिर्फ व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं रहेगी। दिल्ली पहुंचने के बाद भी उन्होंने चंद्रशेखर के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखने और आगे की रणनीति बनाने की बात कही।

वाल्मीकि समाज पर फोकस

भारत लौटने के बाद रोहिणी घावरी की गतिविधियों का एक प्रमुख फोकस वाल्मीकि समाज बताया जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, वह समाज के लोगों को राजनीतिक रूप से एकजुट करने और प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाने की तैयारी में हैं।

उनका तर्क है कि दलित राजनीति में अलग-अलग उपसमुदायों को उनकी आबादी और सामाजिक भूमिका के अनुरूप राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इसी उद्देश्य से उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और मध्य प्रदेश में समाज के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की बात सामने आई है।

सपा से नजदीकी की भी चर्चा

इससे पहले अप्रैल 2026 में आई रिपोर्टों में दावा किया गया था कि रोहिणी घावरी ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से बातचीत की थी और उत्तर प्रदेश में करीब 200 सभाएं करने की योजना की बात कही थी। रिपोर्ट में वाल्मीकि और पासी समेत गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच पहुंच बनाने की रणनीति का भी उल्लेख था।

हालांकि, रोहिणी घावरी के किसी राजनीतिक दल में औपचारिक रूप से शामिल होने की पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए उनकी संभावित राजनीतिक भूमिका को फिलहाल संभावना और राजनीतिक सक्रियता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

2027 से पहले क्या बदलेंगे सियासी समीकरण?

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। ऐसे में रोहिणी घावरी का वाल्मीकि समाज के बीच अभियान शुरू करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

चंद्रशेखर आजाद की राजनीति का आधार भी दलित प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के मुद्दे रहे हैं। ऐसे में रोहिणी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को उनके प्रभाव क्षेत्र में संभावित चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इसका वास्तविक राजनीतिक असर आगामी महीनों में उनकी संगठनात्मक सक्रियता और किसी राजनीतिक दल के साथ उनके औपचारिक संबंध पर निर्भर करेगा।

फिलहाल ‘स्विट्जरलैंड टू सत्ता’ की चर्चा के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रोहिणी घावरी 2027 की यूपी राजनीति में स्वतंत्र चेहरा बनकर उतरेंगी या किसी राजनीतिक दल के साथ मिलकर अपनी सियासी पारी शुरू करेंगी।

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