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काशी से कन्याकुमारी तक ज्ञान, संस्कृति और तकनीक का सेतु बना संगमम : प्रो. कामकोटि

आईआईटी मद्रास की पहल से वाराणसी के जीआई उत्पादों को मिलेगी वैश्विक पहचान, कारीगरों को होगा सीधा लाभ

पूर्वांचल राज्य ब्यूरो चेन्नई।

काशी और तमिलनाडु के बीच हजारों वर्षों से चले आ रहे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ज्ञान संबंधों को नई ऊर्जा देने में काशी तमिल संगमम महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह पहल केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, तकनीक, नवाचार और सामाजिक समन्वय के नए आयाम भी स्थापित कर रही है। यह बात आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि ने पीआईबी के प्रेस टूर पर पहुंचे वाराणसी के पत्रकारों से बातचीत में कही।

‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की सशक्त मिसाल

प्रो. कामकोटि ने कहा कि काशी और तमिलनाडु का रिश्ता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों क्षेत्रों के बीच ज्ञान और शिक्षा की समृद्ध परंपरा भी रही है। प्रधानमंत्री के विजन से शुरू हुई काशी तमिल संगमम ने इस ऐतिहासिक संबंध को आधुनिक भारत के संदर्भ में और मजबूत करने का कार्य किया है।

उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं के लोगों के बीच संवाद बढ़ने से देश की विविधता को समझने और उसका सम्मान करने की भावना और मजबूत होती है। काशी तमिल संगमम वास्तव में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की अवधारणा को साकार करने वाला अभियान बन चुका है।

डिजिटल शिक्षा से मिट रही भौगोलिक दूरियां

आईआईटी मद्रास के निदेशक ने बताया कि संस्थान शिक्षा को अधिक सुलभ और समावेशी बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। एनपीटीईएल और बीएस प्रोग्राम जैसी पहलों के माध्यम से देश के किसी भी हिस्से में रहने वाला विद्यार्थी गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक ने शिक्षा की भौगोलिक सीमाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। साथ ही स्कूल स्तर पर विज्ञान और तकनीक आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देकर बच्चों में वैज्ञानिक सोच, नवाचार और प्रयोगधर्मिता विकसित की जा रही है। कोर इंजीनियरिंग पर विशेष जोर देकर युवाओं के व्यावहारिक कौशल को भी मजबूत बनाया जा रहा है।

वाराणसी के कारीगरों को तकनीक का सहारा

प्रो. कामकोटि ने कहा कि भारत की पारंपरिक कला और शिल्प में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। आधुनिक तकनीक, डिजाइन, गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग और बेहतर बाजार व्यवस्था के माध्यम से इन उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाई जा सकती है। इससे न केवल कारीगरों की आय बढ़ेगी, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी बल मिलेगा।

उन्होंने बताया कि आईआईटी मद्रास ने वाराणसी के कारीगरों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से ‘आर्टिसन एम्पॉवरमेंट लैब’ की शुरुआत की है।

एआई और ब्लॉकचेन से मिलेगी असली पहचान

प्रो. कामकोटि के अनुसार, इस परियोजना के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और ब्लॉकचेन तकनीक की मदद से एक डिजिटल रजिस्ट्री तैयार की जा रही है। बाजार में उपलब्ध असली जीआई उत्पादों पर विशेष क्यूआर कोड लगाया जाएगा, जिसे स्कैन कर ग्राहक उत्पाद की प्रामाणिकता और उसे बनाने वाले कारीगर की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

उन्होंने बताया कि शुरुआती चरण में गुलाबी मीनाकारी और लकड़ी के खिलौनों जैसे पारंपरिक शिल्पों को इस परियोजना से जोड़ा गया है। उनका विश्वास है कि यह तकनीक बिचौलियों की भूमिका को कम करेगी और कारीगरों को वैश्विक बाजार में अपने उत्पादों की उचित कीमत सीधे प्राप्त करने में मदद करेगी।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

प्रो. कामकोटि ने कहा कि काशी तमिल संगमम की सफलता यह साबित करती है कि भारत की विविध भाषाएं, संस्कृतियां, ज्ञान परंपराएं और तकनीकी क्षमताएं मिलकर एक सशक्त एवं आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा, तकनीक, संस्कृति और स्थानीय कौशल को जोड़ने वाली ऐसी पहलों का दायरा भविष्य में और बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि देश की विरासत और नवाचार दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकें।

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