RLD की 33+ सीटों की मांग की चर्चा, BJP 20-25 सीटों के फॉर्मूले पर विचार करती दिख रही; निषाद पार्टी और सुभासपा भी अपने सामाजिक आधार के हिसाब से हिस्सेदारी चाहती हैं
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन में सीट बंटवारे की सियासी जमीन तैयार होने लगी है। अंतिम समझौता अभी सामने नहीं आया है, लेकिन सहयोगी दल अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत और सामाजिक आधार के हिसाब से ज्यादा सीटों के लिए दबाव बनाने में जुटे हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के अध्यक्ष जयंत चौधरी की दावेदारी को लेकर है। रिपोर्टों के मुताबिक RLD की ओर से 2022 में लड़ी गई 33 सीटों के आसपास या उससे ज्यादा सीटों की मांग की चर्चा है, जबकि बीजेपी की ओर से करीब 20 से 25 सीटों का फॉर्मूला सामने आया है।
पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी का दांव
जयंत चौधरी के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राजनीतिक आधार है। जाट मतदाता, किसान राजनीति और क्षेत्रीय संगठन RLD की ताकत माने जाते हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में RLD ने सपा के साथ गठबंधन में 33 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 8 सीटें जीती थीं। हालांकि 2027 में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं, क्योंकि अब RLD बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA का हिस्सा है।
यही वजह है कि 2022 में RLD के खाते में रही कई सीटों पर अब BJP के अपने विधायक हैं। ऐसे में दोनों दलों के बीच सीटों का तालमेल आसान नहीं होगा।
RLD के सामने अपनी पुरानी सीटों का दावा बनाए रखने और BJP के सामने अपने मौजूदा विधायकों तथा सहयोगियों के बीच संतुलन साधने की चुनौती होगी।
संजय निषाद की सक्रियता ने बढ़ाया दबाव
पूर्वांचल में निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद भी अपने राजनीतिक आधार को लेकर लगातार सक्रिय हैं। हाल में गोंडा के व्यापारी विनोद साहनी की हत्या के बाद उन्होंने सरकार से कार्रवाई की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। मामले में पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई और आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई।
इस घटनाक्रम ने निषाद समुदाय के बीच संजय निषाद की राजनीतिक सक्रियता को फिर सुर्खियों में ला दिया है। हाल ही में उनकी सपा नेता माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात ने भी राजनीतिक अटकलों को हवा दी, हालांकि संजय निषाद ने इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया।
2027 के चुनाव में निषाद वोट कई सीटों पर निर्णायक हो सकता है। यही वजह है कि BJP के लिए निषाद पार्टी को साथ रखना केवल गठबंधन की औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ओमप्रकाश राजभर भी संगठन को कर रहे मजबूत
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर भी पूर्वांचल में संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। राजभर लगातार अपने सामाजिक आधार और पार्टी की चुनावी क्षमता को रेखांकित करते रहे हैं।
राजभर ने पहले NDA के सहयोगियों की सामूहिक ताकत पर जोर देते हुए कहा था कि गठबंधन के हर सहयोगी के पास वोट दिलाने की क्षमता है।
इसका सीधा संदेश यही माना जा रहा है कि सीट बंटवारे के दौरान SBSP भी अपनी राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर बेहतर हिस्सेदारी चाहती है।
अनुप्रिया पटेल की पार्टी भी अहम खिलाड़ी
NDA के सीट शेयरिंग गणित में अपना दल (सोनेलाल) भी महत्वपूर्ण है। अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाली पार्टी का कुर्मी और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच प्रभाव माना जाता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में BJP के सहयोगी दलों ने सीमित सीटों पर चुनाव लड़ा था। RLD ने अपनी दोनों सीटें जीतीं, जबकि अपना दल (एस), निषाद पार्टी और SBSP ने एक-एक सीट जीती थी।
विधानसभा चुनाव में सहयोगियों की सीटों का फॉर्मूला इससे अलग हो सकता है, लेकिन पिछला चुनावी प्रदर्शन और जमीनी संगठन बातचीत का आधार जरूर बनेंगे।
NDA में सीट शेयरिंग का संभावित गणित
मौजूदा चर्चाओं के मुताबिक चार प्रमुख सहयोगी दलों के लिए सीट बंटवारे में अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण काम करेंगे—
- RLD: पश्चिमी यूपी, जाट और किसान राजनीति
- निषाद पार्टी: पूर्वांचल और निषाद समुदाय
- SBSP: राजभर एवं अति पिछड़ा वर्ग
- अपना दल (एस): कुर्मी और अन्य पिछड़े वर्ग
एक रिपोर्ट में चारों सहयोगियों को मिलाकर 70-80 सीटों के आसपास का संभावित फॉर्मूला चर्चा में बताया गया है, हालांकि यह अभी अंतिम समझौता नहीं है।
BJP के सामने सबसे बड़ी चुनौती
बीजेपी के लिए समस्या यह है कि उसे सहयोगियों को पर्याप्त सीटें भी देनी हैं और अपने संगठन तथा मौजूदा विधायकों के हितों का भी ध्यान रखना है।
दूसरी तरफ सहयोगी दल जानते हैं कि ज्यादा सीटों का मतलब विधानसभा में ज्यादा विधायक और सरकार बनने की स्थिति में ज्यादा राजनीतिक प्रभाव होगा। इसलिए चुनाव से पहले हर पार्टी अपनी ‘बर्गेनिंग पावर’ बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
BJP की अपनी चुनावी रणनीति भी बूथ स्तर पर मजबूत होने की है। पार्टी ने करीब 18,900 ऐसे बूथों की पहचान की है, जहां 2022 में वह मजबूत थी लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे नुकसान हुआ।
सहयोगियों के लिए भी आसान नहीं होगी राह
NDA में सीटें बढ़ाने की मांग करने वाले सहयोगी दलों के सामने भी सवाल है कि वे जिन सीटों पर दावा कर रहे हैं, वहां जीत की वास्तविक संभावना कितनी है।
खासकर RLD के मामले में 2022 का 33 सीटों वाला आंकड़ा सीधे 2027 पर लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि तब सपा के साथ गठबंधन था और अब BJP के साथ गठबंधन है। पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर BJP के मौजूदा विधायक भी हैं।
इसलिए अंतिम फॉर्मूला सीटों की संख्या के साथ-साथ विनिंग एबिलिटी, स्थानीय समीकरण और वोट ट्रांसफर पर निर्भर कर सकता है।
क्या NDA में सबको साध पाएगी BJP?
यूपी की 403 विधानसभा सीटों में सरकार बनाने के लिए 202 सीटों का आंकड़ा जरूरी होगा। ऐसे में BJP के लिए सहयोगियों के साथ सीटों का तालमेल केवल गठबंधन प्रबंधन नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है।
फिलहाल 33+ सीटों की RLD दावेदारी, BJP का संभावित 20-25 सीटों वाला फॉर्मूला, निषाद पार्टी की पूर्वांचल में सक्रियता और राजभर की संगठनात्मक तैयारी NDA के भीतर चल रही सीट शेयरिंग की शुरुआती तस्वीर दिखाती है।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि BJP सहयोगियों को कितनी सीटें देती है और क्या सभी दल प्रस्तावित फॉर्मूले पर सहमत होते हैं। फिलहाल इतना साफ है कि 2027 का चुनाव आने से पहले NDA के अंदर सीटों की सियासी सौदेबाजी तेज हो चुकी है।










