कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻
ट्रैफिक व्यवस्था या वसूली का खेल?
वाराणसी में ट्रैफिक संभालने का काम सड़क पर कम और व्यवस्था संभालने का खेल कहीं ज्यादा दिखाई देने लगे तो सवाल उठना लाजिमी है। आम आदमी के लिए नियमों की किताब मोटी है, लेकिन कथित बिचौलियों के लिए रास्ते छोटे और आसान होने की शिकायतें आखिर क्यों सुनाई देती हैं ?
कहा जाता है कि ट्रैफिक व्यवस्था कानून से चलती है। लेकिन अगर कहीं यह धारणा बनने लगे कि कानून की धारा से पहले जेब की धारा देखी जाती है, तो फिर विभाग को आईना दिखाना जरूरी है !
चौराहे पर खड़ा आम आदमी नियम तोड़ दे तो चालान तैयार, मगर अगर कोई व्यवस्था के आसपास घूमने वाला कथित “मध्यस्थ” हो तो क्या उसके लिए भी वही कानून है? यही वह सवाल है जिसका जवाब जनता जानना चाहती है !
वर्दी जनता की सुरक्षा के लिए है, वसूली की प्रतिष्ठा के लिए नहीं
पूरा ट्रैफिक विभाग में भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के आरोप नहीं बल्कि सूत्रों की माने तो सैकड़ों वाहन सिर्फ़ वसूली से सड़क पर सरपट दौड़ रहा है जो बिना परमिट और टी आई के संज्ञान में है जिसका 2000 प्रति माह की वसूली की जाती है अब आप सोचिए कितना बड़ा खेल हो रहा है! इस खेल में कोई एक व्यक्ति नहीं पूरी व्यवस्था जो आजादी से अपनी अपनी महीने की इनकम बढ़ा रहा है जिसने बड़े अधिकारी भी शामिल हैं !
“नीचे वाले को पकड़ो, ऊपर वाले को बचाओ और फिर प्रेस नोट जारी कर दो कि भ्रष्टाचार पर बड़ी कार्रवाई की कहानी कब तक ?”
सड़क पर ट्रैफिक जाम हो या व्यवस्था में भ्रष्टाचार—दोनों में रास्ता आम आदमी का ही बंद होता है
वाराणसी को ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां चालान नियम से कटे, पहचान से नहीं; कार्रवाई अपराध पर हो, आदमी देखकर नहीं; और विभाग की कमाई सरकारी खजाने में जाए, किसी कथित दलाल की जेब में नहीं !
जनता सवाल पूछ रही है—ट्रैफिक कौन संभाल रहा है और व्यवस्था किसकी जेब?
….. फिर आगे विशेष स्टोरी के साथ जुड़े रहिए कृष्णा पंडित के साथ ✍🏻










