पिता, भाई, पति और बेटे के संघर्ष को भी समझें, सम्मान और समानता से मजबूत होंगे रिश्ते
पूर्वांचल राज्य संवाददाता : दीपु तिवारी
पिपरी (सोनभद्र) सोशल मीडिया और आम बोलचाल में सुनाई देने वाली “एक कचौड़ी, दो समोसा… मर्दों पर क्या भरोसा” जैसी पंक्तियां भले ही मजाक के तौर पर कही जाती हों, लेकिन इन्हें पूरे पुरुष समाज के चरित्र से जोड़ना विचारणीय है। किसी एक व्यक्ति की गलती के आधार पर सभी पुरुषों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है। परिवार और समाज में पुरुष भी कई जिम्मेदारियां निभाते हैं। पिता बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत करता है, भाई बहन की खुशी और सम्मान का ध्यान रखता है, बेटा माता-पिता का सहारा बनता है और पति परिवार की जरूरतों के लिए संघर्ष करता है। इन जिम्मेदारियों और त्याग को भी समझे जाने की जरूरत है। हालांकि किसी पुरुष द्वारा महिला के साथ हिंसा, उत्पीड़न या अन्याय किया जाता है तो उसके खिलाफ आवाज उठना और कानून के अनुसार कार्रवाई होना जरूरी है। इसी तरह किसी पुरुष के साथ अन्याय या भेदभाव हो तो उसकी पीड़ा को भी सुना जाना चाहिए। गलत व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होनी चाहिए, लिंग से नहीं।सोशल मीडिया के दौर में मजाकिया पंक्तियां भी धीरे-धीरे धारणा का रूप ले सकती हैं। इसलिए महिला बनाम पुरुष की बहस के बजाय सम्मान, समानता और न्याय को केंद्र में रखना जरूरी है। मजबूत रिश्ते शक और कटाक्ष से नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद और सहयोग से बनते हैं। किसी की बहन के सम्मान के लिए खड़ा होने वाला भी पुरुष है, बेटी के सपनों को पूरा करने वाला पिता भी पुरुष है और वृद्ध माता-पिता का सहारा बनने वाला बेटा भी पुरुष है। इसलिए याद रखना होगा—“एक मर्द गलत हो सकता है, लेकिन हर मर्द गलत नहीं होता।”सम्मान महिला का भी जरूरी है और पुरुष का भी। बराबरी का समाज किसी एक वर्ग को नीचा दिखाकर नहीं, बल्कि दोनों के अधिकारों और भावनाओं को समझकर ही मजबूत बनता है।










