स्वर्गीय लक्ष्मी देवी को भावभीनी श्रद्धांजलि, समाज सेवा को मां की सीख को बताया जीवंत रूप
सनातन संस्कृति में मां को प्रथम गुरु, ममता की मूर्ति और साक्षात देवी का स्वरूप माना गया है। मां का प्रेम निःस्वार्थ होता है। उसके त्याग, तपस्या और संस्कारों से ही संतान का जीवन संवरता है। मां के आंचल की छांव जीवन की सबसे बड़ी धरोहर होती है।

मेरे जीवन का सबसे दुखद क्षण वह था, जब मेरी पूज्य माता स्वर्गीय श्रीमती लक्ष्मी देवी जी, धर्मपत्नी अच्छे लाल सेठ, 25 मार्च 2024 को होली के पावन पर्व पर हमें छोड़कर परमधाम चली गईं। आज भी होली के रंग उनकी यादों को ताजा कर देते हैं और मन मां के स्नेह के लिए व्याकुल हो उठता है।
पितृ विसर्जन के इस पावन अवसर पर मां की सीख बार-बार स्मरण आती है— “बेटा, कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो। समाज और जरूरतमंदों के लिए अच्छा करोगे तो ईश्वर स्वयं मार्ग प्रशस्त करेंगे।” उनके ये शब्द आज भी मेरे जीवन के पथप्रदर्शक हैं।
मेरे लिए पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल तर्पण और श्राद्ध तक सीमित नहीं, बल्कि उनके दिए संस्कारों को जीवन में उतारना भी है। जरूरतमंदों की सहायता और समाज सेवा के माध्यम से मानवता की सेवा करना ही मां के प्रति मेरी सच्ची श्रद्धांजलि है।
मां! आपकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। आपके संस्कार और आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी हैं। पितृ विसर्जन पर आपको कोटि-कोटि नमन। ईश्वर आपकी दिव्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
राजू सेठ
राष्ट्रीय अध्यक्ष, आरजेएसपी
भोहर (हनुमानगंज), चोलापुर, वाराणसी।










