Home / Uncategorized / जनता त्रस्त हो चुकी है “सुनवाई की फाइलों” से

जनता त्रस्त हो चुकी है “सुनवाई की फाइलों” से

जनता त्रस्त हो चुकी है “सुनवाई की फाइलों” से

जन जन की आवाज कृष्णा पंडित की कलम✍🏻

जनसुनवाई के लिए लोगों को लगा दिया, खुद कभी जनता से मिलो और उनका दुख-दर्द समझो

अधिकारी और नेता सिर्फ भौकाल में जी रहे हैं, समस्या समाधान जस का तस है

वाराणसी: कहां जाता है कि जब राजा कान का कमजोर और आंख मूंद कर विश्वास अपने सैनिकों पर करता है तो कहीं न कहीं उसको चोट और उसकी बनी बनाई बस्ती उजड़ जाती है ! धरातल पर निरीक्षण के साथ लोगों के साथ संवाद अति आवश्यक है ! बनारस जैसे शहर में अधिकारी और नेता पूरी तरीके से निरंकुश है ज्यादातर अपना काम दूसरे पर थोप कर ताल ठोक रहे हैं जबकि जिले के बड़े प्रशासनिक अधिकारी ने कभी किसी जन संवाद में प्रतिभाग़ नहीं किया ! जब मन चाहे जहां वन वे कर दो जब मन चाहे जहां बिना समस्या जाने अपने से ही समाधान दे दो और तो और बद से बदतर होती व्यवस्था आज सबके लिए चुनौती होता जा रहा है ! विभाग कोई भी हो लूट पाट के साथ अनियंत्रित बेलगाम रास्ते अपनाया जा रहे हैं जो वर्तमान के लिए ही नहीं भविष्य के लिए भी खतरा है ! सुदृढ़ व्यवस्था में सेंध मार कर बदलाव कभी भी परिचायक या विकास का उदाहरण नहीं बना किसी भी कार्य को पूर्णता से संपन्न करने के लिए संवाद और नैतिक जिम्मेदारी लेना ही होगा !
आज सरकारी दफ्तरों और प्रशासनिक तंत्र में “जनसुनवाई” एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गई है। कागजों पर तो लिखा है कि जनसुनवाई जनता की समस्याओं को सुनने और समाधान देने के लिए होती है, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। बड़ा सवाल यह है कि जनसुनवाई में जनता से मिलने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की कुर्सी पर आखिर बैठता कौन है? आमतौर पर वहां अधिकारी खुद मौजूद नहीं होते, बल्कि उनकी जगह उनके कर्मचारी, बाबू, पीआरओ या प्रतिनिधि बैठ जाते हैं। फिर वे जनता की समस्याओं को सुनने का नाटक करते हैं, और तीन–चार महीने तक फ़ाइल इधर-उधर घूमती रहती है।

क्या यही है लोकतंत्र की असली तस्वीर?

जनता उम्मीद लेकर आती है कि कोई उनको सुनेगा, उनका दर्द समझेगा, लेकिन उन्हें मिलता है सिर्फ आश्वासन, और समस्याएँ वही की वही।
जनसुनवाई का मूल उद्देश्य था – जनता और प्रशासन के बीच सेतु बनाना, लेकिन आज ये एक दिखावे की प्रक्रिया बन चुकी है, जहाँ अधिकारी दूर बैठकर फाइलों में समाधान ढूँढते हैं और जनता जमीन पर चक्कर काटती रह जाती है।

सम्मानित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से सवाल..?

जब जनता ने आपको चुनकर कुर्सी दी है, तो क्या उनकी समस्याओं को सुनना सिर्फ औपचारिकता है ?

क्यों नहीं आप खुद उनकी आँखों में देख कर उनका दर्द महसूस करते?

क्यों नहीं आप खुद उस किसान, मजदूर, बुजुर्ग, महिला, या बेरोजगार युवा के पास बैठते और उनसे पूछते कि समस्या क्या है ?

कुर्सी पर बैठकर कागजों में समाधान ढूँढा जा सकता है, लेकिन दिल से समाधान तभी मिलेगा जब समस्याओं को नज़दीक से महसूस किया जाए।

जनता कहती है—
हमको पीआरओ से नहीं, हमको आपसे बात करनी है।
हमें बहाने नहीं, सुनवाई चाहिए।
हमें सिर्फ आवेदन नहीं, समाधान चाहिए।

आलम तो यह है कि बड़े अधिकारी अपने PRO से ही सारी जिम्मेदारी निभा रहे हैं और लोगों को खूब दिलासा दिए हुए हैं जबकि धरातल पर सब उथल-पुथल हो रहा है

असली जनसुनवाई कैसी हो ?

अधिकारी और जनप्रतिनिधि स्वयं मौजूद रहें

हर समस्या पर समयसीमा तय हो

शिकायतकर्ता को समाधान की स्थिति बताई जाए

औपचारिकता नहीं, संवेदनशीलता हो

अब ज़रूरत है दिल से जनसुनवाई की, जहाँ जनता और प्रशासन आमने–सामने बैठे, बिना दूरी, बिना बिचौलिये, और बिना छल-प्रपंच के। कागज़ पर जनसुनवाई काफी है, लेकिन जमीन पर जनसुनवाई जरूरी है।

“कभी खुद भी जनता के बीच आकर बैठिए, उनके दुख-दर्द को महसूस करिए, तभी असली जनसुनवाई होगी।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *