वसूली का जाल और बेपटरी यातायात — वाराणसी की सड़कों की सच्चाई
कृष्णा पंडित की कलम से ✍🏻
वाराणसी: धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक वाराणसी आज एक और वजह से चर्चा में है—बेतरतीब यातायात और अनियंत्रित गाड़ियों का बढ़ता संकट। शहर की सड़कों पर हर दिन जाम, नो-पार्किंग जोन में खड़ी बसें और ऑटो, तथा नियमों की खुली अनदेखी आम दृश्य बन चुके हैं। सवाल यह है कि आखिर इस अव्यवस्था के पीछे असली वजह क्या है?
कागजों में ट्रैफिक नियम सख्त हैं, अभियान चलाए जाते हैं, चालान भी काटे जाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि जमीनी स्तर पर व्यवस्था ढीली और संदिग्ध नजर आती है। आम लोगों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि ट्रैफिक विभाग की वसूली की प्रवृत्ति ही इस अव्यवस्था को बढ़ावा दे रही है।
ट्रैफिक विभाग आलाधिकारी अपने टी आई से महीने की लाखों की कमाई करते हैं नहीं तो शहर की यातायात व्यवस्था इतनी खराब ना होती
हजारों अवैध बसें संचालित होती हैं और अलग-अलग क्षेत्र के टी आई लंका, कैंट, सिगरा, में क्यों नहीं गाड़ियां सीज करते हैं, सैकड़ो बसें रश्मि नगर लंका और अवैध रूप से शहर में दौड़ती नजर आती हैं उसके पीछे प्रमुख वजह सिर्फ वसूली है !
नो-पार्किंग जोन में खड़ी गाड़ियां इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। जहां सख्ती होनी चाहिए, वहां अक्सर “सेटिंग” काम करती है। छोटे वाहन चालकों से लेकर बस ऑपरेटर तक, कई लोग यह मानकर चलते हैं कि थोड़ी-बहुत रकम देकर नियमों को नजरअंदाज किया जा सकता है। परिणामस्वरूप, सड़कों पर अराजकता बढ़ती जाती है और आम नागरिक इसकी कीमत समय, ईंधन और मानसिक तनाव के रूप में चुकाता है। विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि कोई भी टी आई डगामार से लेकर ऑटो ई रिक्शा का चालान नहीं करता क्योंकि मासिक वसूली कर साहब को अनुदान के रूप में प्रसाद पहुंचाता है !
अगर ट्रैफिक व्यवस्था को वास्तव में सुधारना है, तो सबसे पहले इस कथित वसूली तंत्र पर लगाम लगानी होगी। केवल चालान काटना समाधान नहीं है, बल्कि ईमानदारी से नियमों का पालन करवाना जरूरी है। साथ ही, निगरानी प्रणाली को पारदर्शी बनाना, सीसीटीवी और ऑनलाइन चालान व्यवस्था को मजबूत करना, और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना अनिवार्य है।
शहर की सड़कों को व्यवस्थित करना सिर्फ प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी भागीदारी जरूरी है। लेकिन जब व्यवस्था पर ही सवाल खड़े हों, तो सुधार की शुरुआत भीतर से ही करनी होगी।
अंततः, वाराणसी की साख और सुगमता तभी बची रह सकती है, जब ट्रैफिक व्यवस्था “वसूली” नहीं, बल्कि “नियम और सेवा” के सिद्धांत पर चले। वरना आस्था की इस नगरी में अव्यवस्था का यह दाग और गहरा होता जाएगा।










