पुर्वांचल राज्य ब्यूरो वाराणसी
मणिकर्णिका घाट स्थित काशी के प्राचीन और अत्यंत पवित्र तीर्थ चक्रपुष्करणी (मणिकर्णिका कुंड) में माँ मणिकर्णिका देवी का वार्षिक दिव्य श्रृंगार इस वर्ष भी पारंपरिक विधि-विधान एवं भक्तिभाव के साथ सम्पन्न हुआ। इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ देश-विदेश से आए भक्तों ने भाग लिया और माँ के दरबार में अपनी आस्था प्रकट की। दिव्य श्रृंगार व रुद्राभिषेक से वातावरण भक्तिमय बना रहा
अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम के संबंध में प्रधान पुरोहित जयेंद्रनाथ दुबे ‘बब्बू महाराज’ ने जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष में एक बार अक्षय तृतीया की संध्या पर माँ मणिकर्णिका की प्रतिमा को विशेष अनुष्ठान के साथ कुंड परिसर में लाया जाता है। इसके उपरांत विधिपूर्वक माँ का भव्य श्रृंगार किया जाता है, जिसमें पारंपरिक वस्त्र, स्वर्ण-रजत आभूषण एवं पुष्पमालाओं से देवी का अलंकरण किया जाता है। इस दौरान पूरा कुंड परिसर भक्ति और श्रद्धा के वातावरण से सराबोर हो जाता है।
श्रृंगार के पश्चात रात्रि में माँ मणिकर्णिका की भव्य आरती का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भाग लिया। आरती के बाद भक्तों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। इस दौरान पूरा वातावरण “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा, जिससे काशी की आध्यात्मिक ऊर्जा और अधिक प्रखर हो गई।
पुरोहितों के अनुसार, काशी में निवास करने वाले लोग एवं मोक्ष की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालु अक्षय तृतीया के एक दिन बाद इस पवित्र कुंड में स्नान कर माँ मणिकर्णिका के दर्शन-पूजन करते हैं। अगले दिन माँ को छप्पन भोग अर्पित किया जाता है तथा कुंड में स्नान की विशेष धार्मिक प्रक्रिया प्रारंभ होती है। मान्यता है कि इस दिन कुंड में स्नान करने से भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, उनके जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है और समस्त कष्टों एवं रोगों से मुक्ति मिलती है।
यह आयोजन काशी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं और सनातन संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी इस दिव्य श्रृंगार एवं पूजा-अर्चना ने श्रद्धालुओं के हृदय में गहरी आस्था और भक्ति का संचार किया, जिससे काशी की आध्यात्मिक महिमा और अधिक उजागर हुई।










