प्रयागराज-लखनऊ | डिजिटल डेस्क
उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति और त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था से जुड़ी इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार के उस ऐतिहासिक और बड़े फैसले पर फिलहाल अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद वर्तमान ग्राम प्रधानों को ही उनकी पंचायतों का ‘प्रशासक’ नियुक्त कर दिया गया था।
कोर्ट के इस कड़े आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में चल रहे विकास कार्यों और प्रशासनिक कमान को लेकर एक बड़ा असमंजस खड़ा हो गया है। इस अदालती फैसले को योगी सरकार और राष्ट्रीय पंचायत राज ग्राम प्रधान संघ के लिए एक बहुत बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है।
सीएम योगी ने दी थी मंजूरी, पहली बार टूटी थी पुरानी परंपरा
उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों के प्रधानों का कार्यकाल इसी वर्ष 25 मई को समाप्त हो गया था। गांवों के विकास कार्यों की निरंतरता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय पंचायत राज ग्राम प्रधान संघ लंबे समय से यह मांग कर रहा था कि निवर्तमान प्रधानों को ही आगे की जिम्मेदारी दी जाए। इसी मांग को स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंचायतीराज विभाग के एक विशेष प्रस्ताव को हरी झंडी दी थी, जिसके बाद सरकार ने प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया था।
क्यों खास था सरकार का फैसला:
उत्तर प्रदेश के पंचायती राज इतिहास में यह पहली बार हुआ था जब कोई पुरानी परंपरा टूटी थी। अब तक की व्यवस्था के अनुसार, प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद आमतौर पर सहायक विकास अधिकारी (ADO Panchayat) या सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता रहा है। सरकार के इसी नए नीतिगत आदेश को कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने ब्रेक लगा दिया है।
जुलाई में क्षेत्र और जिला पंचायतों का भी खत्म हो रहा है कार्यकाल
हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसे बेहद नाजुक मोड़ पर आया है जब राज्य की त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के अन्य दो बड़े स्तंभों का कार्यकाल भी समाप्त होने की कगार पर है।
-
जिला पंचायतें: प्रदेश में जिला पंचायतों का कार्यकाल 11 जुलाई को समाप्त होने जा रहा है।
-
क्षेत्र पंचायतें (बीडीसी): क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल भी महज 19 जुलाई तक ही है।
ऐसे में ग्राम प्रधानों को लेकर आए कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब जिला और क्षेत्र पंचायतों के भविष्य के प्रबंधन पर भी गहरे सवालिया निशान लग गए हैं कि वहां कार्यकाल खत्म होने के बाद कमान किसे सौंपी जाएगी।
मुख्य बिंदु और मामले का पूरा स्टेटस
| विवरण | इनसाइड स्टोरी और ताजा अपडेट |
| बड़ा फैसला | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाने पर लगाई अंतरिम रोक। |
| प्रधानों का कार्यकाल | इसी वर्ष 25 मई को समाप्त हो चुका है। |
| जिला व क्षेत्र पंचायत | जिला पंचायत 11 जुलाई और क्षेत्र पंचायत 19 जुलाई को हो रही हैं समाप्त। |
| चुनावों पर असर | परिसीमन और OBC आयोग की रिपोर्ट में देरी के चलते चुनाव लंबे समय के लिए टले। |
| अगली संभावना | यूपी पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव 2027 के बाद ही होने के आसार। |
अब विधानसभा चुनाव 2027 के बाद ही होंगे पंचायत चुनाव!
इस पूरे कानूनी घटनाक्रम के बीच उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की तारीखों को लेकर चल रही अटकलें अब पूरी तरह साफ होती नजर आ रही हैं। सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव अब लंबे समय के लिए ठंडे बस्ते में जा सकते हैं और इनके यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के बाद ही कराए जाने की प्रबल संभावना है।
चुनावों में हो रही इस भारी देरी के पीछे 3 मुख्य वजहें:
-
कानूनी दांवपेच: हाईकोर्ट में पंचायतों के कार्यकाल और एडहॉक (तदर्थ) व्यवस्था को लेकर चल रही विभिन्न कानूनी प्रक्रियाएं।
-
परिसीमन का मुद्दा: कई जिलों में नए शहरी क्षेत्रों के शामिल होने के बाद ग्राम पंचायतों के नए सिरे से परिसीमन (सीमा निर्धारण) के अटके काम।
-
OBC आयोग की रिपोर्ट: संबंधित पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतिम रिपोर्ट और आरक्षण के निर्धारण में हो रही प्रशासनिक देरी।
बहरहाल, हाईकोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद अब गेंद एक बार फिर सरकार के पाले में है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि योगी सरकार गांवों के विकास कार्य ठप होने से बचाने के लिए क्या नया कानूनी या प्रशासनिक रास्ता (जैसे दोबारा सरकारी अफसरों को कमान सौंपना) निकालती है।









