आजादी के 79 साल बाद भी, 1942 के धानापुर कांड में शहीद हुए बिरना गांव निवासी चिंगनू चमार के नाम पर कोई स्मृति गेट या संग्रहालय नहीं बना है। उनका परिवार आज भी झोपड़ी और करकट के घरों में रहने को मजबूर है, जबकि देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है।
चिंगनू चमार का नाम 1942 के धानापुर कांड में शहीदों की सूची में दूसरे स्थान पर अंकित है। गांधीजी के आह्वान पर आजादी से पांच वर्ष पहले, 16 अगस्त 1942 को धानापुर के सेनानियों ने थाना परिसर में तिरंगा फहराया था, जिसमें आठ लोग शहीद हुए थे।
क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों पर आरोप है कि वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार को सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिला पाए हैं। कस्बे में शहीदों की याद में शहीद स्मारक बनाया गया है, जिसमें शहीद हीरा सिंह, रघुनाथ सिंह और महँगू सिंह की प्रतिमाएं लगाई गई हैं। अन्य शहीदों के गांवों में भी स्मृति द्वार बनाए गए हैं।
हालांकि, चिंगनू चमार के गांव बिरना में आज तक कोई स्मृति द्वार का निर्माण नहीं कराया गया है। उनके परिवार के लोगों को सरकारी आवास की सुविधा भी नहीं मिली है और वे आज भी छप्पर और करकट में रहने को मजबूर हैं।
शहीद चिंगनू चमार के पौत्र रामनरेश उर्फ पंडित जी ने बताया कि उनके दादा का नाम शहीदों की सूची में दूसरे स्थान पर अंकित है, लेकिन आजादी के कई साल बीत जाने के बाद भी उनके परिवार को सरकार की किसी योजना का लाभ नहीं मिला है। उन्होंने यह भी बताया कि 15 अगस्त 2023 को केवल प्रधानमंत्री का एक बोर्ड लगाया गया था, लेकिन परिवार को कोई सुविधा नहीं मिली।
इस उपेक्षा को लेकर परिवार सहित ग्रामीणों में रोष व्याप्त है। ग्रामीण नंदलाल, रामप्रताप, प्रकाश, महेंद्र, शिवमूरत, होरिल, अभिमन्यु, संतोष, बबलू सहित अन्य लोगों ने शहीद चिंगनू चमार के नाम पर स्मृति द्वार और स्मारक बनाए जाने की मांग की है।










