कृष्णा पंडित की कलम से ✍🏻
काशी की गलियों में अब सवाल धीमे स्वर में नहीं, बल्कि खुलेआम गूंज रहा है—जुए पर पहरा है या पहरेदार ही बेहाल हैं?
बाबा विश्वनाथ की नगरी की पहचान अध्यात्म, आस्था और संस्कृति से है। लेकिन अगर जुए के अड्डों की शिकायतें बार-बार सामने आएं और कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहें, तो यह सिर्फ जुआरियों की समस्या नहीं रह जाती—यह कानून-व्यवस्था की साख पर सीधा सवाल बन जाती है।
जुआ किसी परिवार के लिए मनोरंजन नहीं, बर्बादी की पहली सीढ़ी है। गरीब की मेहनत की कमाई से लेकर मध्यमवर्गीय परिवार की बचत तक, यह बीमारी सब कुछ निगल सकती है। इसके साथ कर्ज, विवाद, अपराध और सामाजिक पतन का रास्ता भी खुलता है।
फिर सवाल बेहद सीधा है—अगर आम आदमी को किसी संदिग्ध गतिविधि की भनक लग सकती है, तो जिम्मेदार तंत्र की निगाह वहां तक क्यों नहीं पहुंचती?
और अगर शिकायतों के बावजूद वही गतिविधियां दोबारा दिखाई देती हैं, तो शक की सुई स्वाभाविक रूप से व्यवस्था की ओर घूमती है। क्या निगरानी कमजोर है? क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे की है? या फिर कहीं कोई ऐसा दबाव है जिसके आगे कानून की धार कुंद पड़ जाती है?
सबसे बड़ा सवाल संरक्षण का है। अगर कहीं जुआ संचालित हो रहा है तो केवल छोटे मोहरों पर कार्रवाई क्यों? असली खिलाड़ी कौन हैं? पैसा किसका है? नेटवर्क किसका है? और अगर किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण सामने आता है तो क्या कानून उसके दरवाजे पर भी उसी ताकत से दस्तक देगा?
काशी की जनता को अब प्रेस नोट नहीं, परिणाम चाहिए
जुए के खिलाफ कार्रवाई हो तो ऐसी हो कि अड्डा चलाने वाला दोबारा कानून को चुनौती देने की हिम्मत न करे। और यदि किसी पर लगाए गए आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच करके दूध का दूध और पानी का पानी किया जाए।
क्योंकि वर्दी की प्रतिष्ठा अपराधियों की संख्या से नहीं, अपराध के खिलाफ उसकी निष्पक्ष कार्रवाई से तय होती है।
काशी पूछ रही है—
जुए के अड्डों पर ताला लगेगा या सिर्फ फाइलों पर कार्रवाई की मोहर लगेगी ?
शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण पूरी तरीके से जुए के साए में है और ठेकेदार सिंघम की वसूली लोगों की हाय में है!
पहरेदार जागेंगे या जुआरी ही रातों की नींद उड़ाते रहेंगे?









