उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बहुजन समाज पार्टी की राजनीतिक दिशा एक बार फिर चर्चा में है। पार्टी प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को सभी जिम्मेदारियों से हटाने के बाद अब उनके छोटे भाई ईशान आनंद को संगठन में अहम भूमिका दी है। इस बदलाव ने मायावती के राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।बसपा लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में कमजोर होती दिखाई दे रही है। 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली पार्टी लगातार चुनावों में अपना जनाधार खोती गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी। वहीं, 2022 के विधानसभा चुनाव में मिली इकलौती सीट के विधायक के निधन के बाद विधानसभा में भी पार्टी का कोई प्रतिनिधि नहीं बचा है।मायावती ने जून 2019 में आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया था। दिसंबर 2023 में उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया और 2024 के लोकसभा चुनाव में युवा चेहरे के तौर पर आगे किया गया। हालांकि, सीतापुर की एक सभा में दिए गए उनके भाषण को लेकर विवाद के बाद मई 2024 में मायावती ने उन्हें अपरिपक्व बताते हुए जिम्मेदारियों से हटा दिया। कुछ समय बाद आकाश की पार्टी में वापसी भी हुई।मार्च 2025 में एक बार फिर आकाश और मायावती के बीच दूरी बढ़ी। उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद आकाश को भी नेशनल कोऑर्डिनेटर पद से हटाकर पार्टी से बाहर कर दिया गया। हालांकि करीब एक महीने बाद उन्हें दोबारा पार्टी में जगह मिली और उनकी जिम्मेदारी बढ़ाते हुए नेशनल कोऑर्डिनेटर के साथ चीफ की भूमिका भी दी गई। अगस्त 2025 में उन्हें नेशनल कन्वेनर बनाया गया।लेकिन 3 सितंबर को मायावती ने एक बार फिर आकाश आनंद को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया और इस बार उनके छोटे भाई ईशान आनंद को आगे बढ़ाया।आकाश के मुकाबले इस बार बदलाव इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि मायावती ने उनकी जगह उनके छोटे भाई ईशान आनंद को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी है। 27 वर्षीय ईशान ने भी इंग्लैंड में पढ़ाई की है और लीगल स्टडीज में ग्रेजुएट हैं।ईशान को मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाया गया है और उन्हें 15 राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। हालांकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को उनके दायरे से बाहर रखा गया है। उनकी गतिविधियों और कामकाज की समीक्षा की जिम्मेदारी उनके पिता और बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार के पास रहेगी।अब सवाल यह है कि क्या ईशान लंबे समय तक मायावती का भरोसा कायम रख पाएंगे? क्या भविष्य में आकाश की फिर वापसी होगी या दोनों भाई मिलकर पार्टी में अपनी बुआ का साथ देंगे? फिलहाल इन सवालों का जवाब मायावती के अलावा किसी के पास नहीं है।बसपा की सबसे बड़ी ताकत उसका दलित वोट बैंक रहा है। 1989 में महज 9.90 फीसदी वोट और दो लोकसभा सीटों से शुरू हुआ पार्टी का सफर 2009 तक 27.42 फीसदी वोट और 20 सीटों तक पहुंचा। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर घटकर 9.15 फीसदी रह गया और उसे एक भी सीट नहीं मिली।इसी चुनाव में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के चंद्रशेखर आजाद ने नगीना सीट से बड़ी जीत दर्ज की। नगीना में बसपा को महज 13,212 वोट मिले। उत्तर प्रदेश की 79 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद बसपा किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर नहीं पहुंच सकी। 15 सीटों पर पार्टी को 50 हजार से भी कम वोट मिले।2007 में बसपा ने दलित वोट के साथ ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों का समर्थन जोड़कर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। लेकिन पार्टी इसके बाद उस सामाजिक समीकरण को दोहराने में सफल नहीं रही। मायावती की राजनीति का मुख्य आधार उत्तर प्रदेश रहा है, लेकिन लगातार चुनावी नतीजों ने पार्टी की स्थिति कमजोर की है। चुनावी हार के साथ संगठन और कार्यकर्ताओं से दूरी भी बसपा के सामने बड़ी चुनौती बन गई है।मायावती अक्सर गठबंधन की राजनीति को लेकर यह तर्क देती रही हैं कि बसपा के वोट सहयोगी दल को तो मिल जाते हैं, लेकिन सहयोगी के वोट बसपा के खाते में नहीं आते। हालांकि 2019 का लोकसभा चुनाव इस दावे से अलग तस्वीर पेश करता है। 2019 में सपा और बसपा ने मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में बसपा ने उत्तर प्रदेश की 10 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि सपा को पांच सीटें मिलीं। इसके बावजूद बाद में मायावती ने गठबंधन खत्म कर दिया। इसके बाद 2022 का विधानसभा चुनाव बसपा ने अकेले लड़ा और पार्टी सिर्फ एक सीट तक सिमट गई। 2024 में लोकसभा चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुला।बसपा को कांशीराम की मजबूत कैडर आधारित राजनीति की विरासत मिली थी। लेकिन समय के साथ पार्टी के कई पुराने और पहचाने जाने वाले चेहरे उससे अलग हो गए। मायावती की कार्यशैली और संगठन में तेजी से होने वाले बदलावों को भी पार्टी की कमजोर होती स्थिति की वजहों में गिना जाता है। चुनाव के समय बड़ी रैलियों के अलावा मायावती की राजनीतिक सक्रियता सीमित दिखाई देती है। कार्यकर्ताओं और आम लोगों तक उनकी पहुंच भी पहले की तुलना में कम हुई है। पार्टी में किसी नेता को कभी भी पद से हटाने या बाहर करने के फैसलों ने भी संगठन में अस्थिरता की स्थिति पैदा की है।भाजपा के मजबूत होने के बाद बसपा के सामने एक और चुनौती खड़ी हुई है। विरोधी दल कई बार उस पर भाजपा की मदद करने के आरोप लगाते रहे हैं और उसे भाजपा की ‘बी टीम’ तक कहा जाता है। हालांकि बसपा इन आरोपों को खारिज करती रही है।मुस्लिम वोटों के बीच भी सपा ने बसपा के खिलाफ यह धारणा मजबूत की है कि वह भाजपा के खिलाफ प्रभावी विकल्प नहीं है। इसका असर पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक पर भी पड़ा है।ऐसे समय में 2027 का विधानसभा चुनाव मायावती और बसपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के सामने न सिर्फ अपना खोया जनाधार वापस हासिल करने की चुनौती है, बल्कि संगठन को मजबूत करने और अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर स्पष्ट दिशा तय करने का सवाल भी है।
मायावती के बदले फैसलों के बीच परिवार पर भरोसा कितना कायम? आकाश के बाद ईशान को मिली बड़ी जिम्मेदारी










