मुजफ्फरनगर के फास्ट ट्रैक कोर्ट के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर चर्चा में हैं। शाहपुर के शहजादी हत्याकांड में दोषी पति नदीम को मृत्युदंड सुनाते हुए उन्होंने अपने फैसले में न्यायिक स्वतंत्रता और कथित दबाव को लेकर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने लिखा कि वे डर के माहौल में काम करने के बजाय न्यायिक संस्था से इस्तीफा देना बेहतर समझेंगे।
फैसले में लिखा डरपोक कहलाना मंजूर नहीं
जज रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में कहा कि यदि न्यायाधीश बाहुबलियों माफिया या अपराधियों के दबाव में काम करने लगे तो जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर होगा। उन्होंने अपने सिद्धांतों पर कायम रहने की बात कहते हुए लिखा कि जरूरत पड़ी तो वह सेवा से इस्तीफा देना पसंद करेंगे।
पांच महीने में 23 दोषियों को मृत्युदंड
रिपोर्टों के मुताबिक जज दिवाकर ने मुजफ्फरनगर में अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 10 मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है। उनकी 17 वर्ष की न्यायिक सेवा में अलग-अलग मामलों में मृत्युदंड पाने वाले दोषियों की संख्या 36 बताई गई है।
करीब 100 गंभीर मामले दूसरे कोर्ट में भेजे गए
इसी बीच उनकी अदालत में लंबित गंभीर आपराधिक मामलों को लेकर भी चर्चा है। रिपोर्टों के अनुसार करीब 100 मामले उनकी अदालत से वापस लेकर दूसरे न्यायालय में भेजे गए। एक रिपोर्ट में प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर यह संख्या 97 बताई गई है। इन मामलों में हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े मुकदमे शामिल हैं।
शहजादी हत्याकांड में पति को मृत्युदंड
ताजा फैसले में शाहपुर की शहजादी की हत्या के मामले में उसके पति नदीम को मृत्युदंड सुनाया गया। अदालत ने मामले में महिला के मृत्यु पूर्व बयान को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना, जबकि कुछ गवाह बाद में अपने पूर्व बयानों से मुकर गए थे।
जज के बयान ने बढ़ाई चर्चा
जज की टिप्पणियों के सामने आने के बाद न्यायिक स्वतंत्रता और अदालतों पर बाहरी दबाव के मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि कथित धमकियों और मामलों को ट्रांसफर किए जाने के कारणों को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग विवरण सामने आए हैं, इसलिए इन्हें अंतिम निष्कर्ष के बजाय उपलब्ध रिपोर्टों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।









