पूर्वांचल राज्य ब्यूरो
महराजगंज ( घुघली) पल्टू मिश्रा
जीउतिया व्रतधारियों की रात बनी ‘अंधेरे की परीक्षा’
महराजगंज,हाय रे बिजली! गजब तेरी कहानी! जनता तुम्हें बिजली कहती है, लेकिन तुम्हारी करतूतें देखकर लगता है कि तुम “दर्शन विभाग” में नौकरी करती हो—आती हो, एक झलक दिखाती हो और फिर ऐसे गायब होती हो जैसे जनता ने तुम्हें उधार का पैसा मांग लिया हो!
महराजगंज में आधी रात का मंजर बिजली व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी था। माताएं-बहनें निर्जला जीवित्पुत्रिका व्रत रखकर संतान की लंबी उम्र की कामना कर रही थीं। दिनभर भूख-प्यास सहने के बाद रात में कुछ राहत की उम्मीद थी, लेकिन बिजली महारानी ने शायद तय कर लिया था कि व्रतधारियों की परीक्षा अभी बाकी है।
उमस, अंधेरा और बेचैनी के बीच लोग बिजली का इंतजार करते रहे। मोबाइल की रोशनी से घर रोशन करने वाली जनता मन ही मन यही पूछती रही—आखिर बिजली विभाग की नींद कब खुलेगी?
कमाल की व्यवस्था है! बिजली का बिल समय पर चाहिए, मीटर की रीडिंग समय पर चाहिए, भुगतान में देरी हो तो कार्रवाई समय पर चाहिए—लेकिन बिजली देने की बारी आए तो समय का कोई मतलब नहीं!
कभी फाल्ट, कभी ट्रिपिंग, कभी मेंटेनेंस और कभी कोई नया बहाना। जनता पूछे तो जवाब तैयार—“लाइन देखी जा रही है।” लेकिन सवाल यह है कि लाइन कब ठीक होगी, यह देखने वाला कौन है?
त्योहारों और व्रत के दिनों में निर्बाध आपूर्ति की उम्मीद करना भी शायद अब जनता की गलती हो गई है। बिजली विभाग की व्यवस्था ऐसी लगती है जैसे बिजली नहीं, सरकारी मेहमान हो—जब मन हुआ आई, जब मन हुआ चली गई।
सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि आधुनिक भारत डिजिटल युग में पहुंच गया, लेकिन गांव-कस्बों की जनता आज भी बिजली आने पर मोबाइल चार्ज करने और जाने पर टॉर्च ढूंढने में व्यस्त है।
अब जनता पूछ रही है—क्या अंधेरे में रहना भी बिजली विभाग की नई सेवा योजना है? क्या बिल के साथ रोशनी की गारंटी खत्म हो चुकी है? और आखिर वह दिन कब आएगा जब बिजली महारानी दर्शन देने नहीं, लगातार रहने आएंगी?
जनता को बिजली चाहिए, बहाने नहीं। बिल की पर्ची नहीं, निर्बाध रोशनी चाहिए। अब विभाग को तय करना होगा—जनता अंधेरे में रहेगी या व्यवस्था की आंखें खुलेंगी?










