7वें वर्ष तक 6.80 करोड़ वार्षिक आय का अनुमान
पूर्वांचल राज्य
पवित्र नगरी वाराणसी में पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की जा रही है। नगर निगम द्वारा सुजाबाद-डोमरी क्षेत्र में 350 बीघा भूमि पर आधुनिक ‘शहरी वन’ विकसित किया जा रहा है, जो गंगा तट की हरियाली को नई पहचान देगा। एक मार्च 2026 को यहां 3,17,120 पौधों के सामूहिक रोपण के साथ इस महत्वाकांक्षी परियोजना का शुभारंभ होगा।
यह शहरी वन केवल वृक्षारोपण अभियान नहीं, बल्कि पर्यावरण और अर्थशास्त्र के संगम का एक सशक्त मॉडल है। परियोजना के तीसरे वर्ष से ही राजस्व प्राप्ति का अनुमान है, जो सातवें वर्ष तक बढ़कर लगभग 6.80 करोड़ रुपये वार्षिक तक पहुंच सकता है। पांच वर्षों में कुल 19.80 करोड़ रुपये की आय का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
मियावाकी पद्धति से तैयार होगा हरित इको-सिस्टम
परियोजना में मियावाकी तकनीक और आधुनिक प्रबंधन प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। यह वन घना, बहु-स्तरीय और जैव विविधता से भरपूर होगा।
यहां छायादार, फलदार, औषधीय और सजावटी प्रजातियों का समन्वय किया गया है, जिससे यह क्षेत्र एक आत्मनिर्भर इको-सिस्टम के रूप में विकसित होगा।
वन में शीशम, सागौन, अर्जुन, पीपल, महुआ, बॉस, महोगनी जैसी 27 से अधिक देशी प्रजातियों के पेड़ लगाए जाएंगे। फलदार वृक्षों में आम, अमरूद, अनार, शहतूत, नींबू, बेल और करौंदा शामिल हैं। वहीं अश्वगंधा, शतावरी, गिलोय और एलोवेरा जैसे औषधीय पौधे तथा गुलाब, चमेली, हरसिंगार (पारिजात), कचनार और गुड़हल जैसे फूलों के पौधे भी लगाए जाएंगे।
स्मार्ट सिंचाई व्यवस्था
भीषण गर्मी (मार्च से जून) में पौधों की सुरक्षा के लिए पांच बोरवेल स्थापित किए गए हैं। 10,827 मीटर लंबी पाइपलाइन और 360 रेन गन स्प्रिंकलर सिस्टम के माध्यम से सप्ताह में तीन बार 45 मिनट की सिंचाई सुनिश्चित की जाएगी। इससे पौधों की जीवित रहने की दर (सर्वाइवल रेट) बढ़ेगी।
मार्च में शुभारंभ के पीछे वैज्ञानिक कारण
विशेषज्ञों के अनुसार मार्च का प्रथम सप्ताह रोपण के लिए अनुकूल समय है। मानसून से पहले पौधों की जड़ें मजबूत हो जाती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है। गंगा तट पर स्थित इस क्षेत्र में बरसात से पहले जड़ों का फैलाव प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कार्य करेगा। साथ ही अप्रैल-मई की गर्मी से पहले पौधे नए वातावरण में ढल जाएंगे।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का संगम
नगर निगम की यह पहल गंगा किनारे हरियाली बढ़ाने, वायु गुणवत्ता सुधारने और जैव विविधता को सशक्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। साथ ही फल, फूल और औषधीय पौधों से होने वाली आय इसे आत्मनिर्भर मॉडल बनाएगी।
नगर निगम का दावा है कि यह शहरी वन आने वाली पीढ़ियों के लिए “ऑक्सीजन बैंक” का कार्य करेगा और काशी की हरित पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाई देगा।










