अमित पाठक अपनी कलम से
पूर्वांचल की पावन धरती, जहां संत परंपरा और सनातन संस्कृति की जड़ें सदियों से मजबूत रही हैं, वहीं इन दिनों एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है क्या सच में इतने “महामंडलेश्वर” हैं, या यह उपाधि अब महज़ दिखावे और प्रभाव का माध्यम बनती जा रही है?
धर्म जगत में “महामंडलेश्वर” की उपाधि कोई सामान्य संबोधन नहीं। यह वर्षों की तपस्या, त्याग और परंपरा की स्वीकृति के बाद मिलती है। लेकिन हाल के वर्षों में देखा जा रहा है कि कई लोग अपने नाम के आगे यह उपाधि लगाकर खुलेआम घूम रहे हैं। सवाल यह है कि इनकी वैधता की जांच कौन करेगा?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यदि निष्पक्ष और सख्त जांच हो, तो बड़ी संख्या में ऐसे चेहरे सामने आ सकते हैं जिनके पास न तो विधिवत मान्यता है, न कोई पारंपरिक आधार। कुछ लोग सामाजिक प्रभाव, भीड़ जुटाने और आर्थिक लाभ के लिए इस पदवी का उपयोग कर रहे हैं ऐसा आरोप संत समाज के भीतर से ही उठने लगा है।
एक वरिष्ठ साधु ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा
“महामंडलेश्वर बनना आसान नहीं। अगर कोई स्वयं ही घोषणा कर दे और समाज चुप रहे, तो यह परंपरा के लिए खतरे की घंटी है।”
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन के पास कोई ऐसा तंत्र है जो धार्मिक उपाधियों के दुरुपयोग पर नज़र रख सके? यदि कोई व्यक्ति स्वयं को ऊंची धार्मिक पदवी से अलंकृत कर ले, तो उसकी प्रमाणिकता जांचने की जिम्मेदारी किसकी है?
पूर्वांचल की आस्था कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां पद और प्रतिष्ठा का परीक्षण बिना मानक के होता रहे। यदि आज चुप्पी रही, तो कल हर गली में एक “महामंडलेश्वर” दिखाई देगा और असली साधना, असली संत और असली परंपरा भीड़ में खो जाएगी।
धर्म का वस्त्र पहनकर यदि भ्रम का कारोबार हो रहा है, तो यह केवल आस्था से छल नहीं, बल्कि समाज की चेतना के साथ भी खिलवाड़ है।
अब वक्त है स्पष्टता का।
जांच हो खुलकर हो।
सच्चाई सामने आए बिना दबाव के।
क्योंकि सवाल किसी व्यक्ति का नहीं, परंपरा की पवित्रता का है।










