✍️ अमित पाठक अपनी कलम से
हर साल की तरह इस साल भी वही कहानी दोहराई जा रही है। स्कूलों की मनमानी, बढ़ती फीस, महंगी कॉपियाँ और किताबें इन सबके खिलाफ आवाज़ उठती है, अभिभावक नाराज़ होते हैं, कुछ दिन तक मुद्दा गरम रहता है, लेकिन फिर सब कुछ शांत हो जाता है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?
क्या वजह है कि हर बार शिकायतों का अंबार लगता है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखती? क्या प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रह गया है? या फिर कहीं न कहीं व्यवस्था में ही कोई ऐसी खामी है जो इन स्कूलों को मनमानी करने की खुली छूट देती है?
आज अभिभावक सबसे ज्यादा परेशान हैं। एक ओर महंगाई की मार, दूसरी ओर बच्चों की शिक्षा का बोझ इन दोनों के बीच आम आदमी पिसता जा रहा है। स्कूलों द्वारा तय की गई ऊंची फीस, जबरन विशेष दुकानों से किताब-कॉपी खरीदने का दबाव, और हर साल नए नियम ये सब एक सुनियोजित व्यवस्था का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जब भी इस मुद्दे को उठाया जाता है, कुछ दिनों के लिए प्रशासन सक्रिय होता है, जांच के आदेश दिए जाते हैं, और फिर धीरे-धीरे मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। न कोई सख्त कार्रवाई, न कोई स्थायी समाधान।
क्या शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि व्यवसाय बन चुकी है? क्या बच्चों का भविष्य अब केवल मुनाफे का जरिया बनकर रह गया है?
जरूरत है कि इस मुद्दे को केवल चर्चा तक सीमित न रखा जाए, बल्कि ठोस और सख्त कदम उठाए जाएं। फीस पर नियंत्रण, किताबों की कीमतों में पारदर्शिता और स्कूलों की जवाबदेही तय करना अब समय की मांग है।
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक हर साल यही खबर बनती रहेगी मुद्दा उठेगा, शोर मचेगा, और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा।
लेकिन सवाल फिर भी वहीं रहेगा आखिर क्यों?










