Home / Uncategorized / नौनिहालों के भविष्य पर नोटो का घेरा, बेहाल परिजन नाकाम सरकार ,बढ़ा रही है शिक्षा माफियाओं का व्यापार

नौनिहालों के भविष्य पर नोटो का घेरा, बेहाल परिजन नाकाम सरकार ,बढ़ा रही है शिक्षा माफियाओं का व्यापार

कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻

देश का भविष्य कहे जाने वाले नौनिहाल आज शिक्षा के नाम पर एक ऐसे जाल में फंसते जा रहे हैं, जहां ज्ञान से ज्यादा नोटों की अहमियत है। स्कूल और कोचिंग संस्थान अब शिक्षा के मंदिर कम और मुनाफे के अड्डे ज्यादा बनते जा रहे हैं। इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा पिस रहा है आम परिवार, जिसकी कमर फीस, किताबों और अन्य खर्चों के बोझ तले टूटती जा रही है।

बच्चों का भविष्य दांव पर है जब शिक्षा व्यवसाय बन जाती है…

आज स्थिति यह है कि एक सामान्य परिवार अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए अपनी जरूरतों से समझौता कर रहा है। महंगी फीस, डोनेशन, यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट और अलग-अलग नामों पर वसूली—यह सब मिलाकर शिक्षा एक महंगा सौदा बन चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके बदले में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? जवाब अक्सर “नहीं” में ही मिलता है।

सरकार की नीतियां कागजों तक सीमित नजर आती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और नियंत्रण की कमी ने शिक्षा माफियाओं को खुली छूट दे दी है। निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की मनमानी फीस पर लगाम लगाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरे खेल में बच्चों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। जब शिक्षा व्यवसाय बन जाती है, तो उसमें संवेदनशीलता और गुणवत्ता दोनों ही पीछे छूट जाते हैं। बच्चे रटने की मशीन बनते जा रहे हैं, उनकी रचनात्मकता और सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

परिजन भी मजबूरी में इस व्यवस्था का हिस्सा बनते जा रहे हैं। विरोध करने पर बच्चे के भविष्य का डर, और चुप रहने पर आर्थिक बोझ—यह दोहरी मार उन्हें तोड़ रही है। यह स्थिति केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या बन चुकी है।

जरूरत है कि सरकार सख्त कदम उठाए और शिक्षा को व्यापार बनने से रोके। फीस नियंत्रण, पारदर्शी व्यवस्था और जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है। साथ ही समाज को भी जागरूक होकर इस लूट के खिलाफ आवाज उठानी होगी।

अगर आज भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य सिर्फ नोटों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह जाएगा। शिक्षा का असली उद्देश्य—ज्ञान, संस्कार और विकास—कहीं पीछे छूट जाएगा, और तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *