Home / Uncategorized / वाराणसी की यातायात व्यवस्था को लेकर सुने हैं ट्रैफिक विभाग बड़ी मुस्तैद है फिर दुकानदारी का क्या होगा..?

वाराणसी की यातायात व्यवस्था को लेकर सुने हैं ट्रैफिक विभाग बड़ी मुस्तैद है फिर दुकानदारी का क्या होगा..?

कृष्णा पंडित की कलम से ✍🏻

वाराणसी की सड़कों पर इन दिनों एक अजीब सा “अनुशासन” दिखाई दे रहा है। कहा जा रहा है कि ट्रैफिक विभाग अब पहले से ज्यादा मुस्तैद हो गया है—हर चौराहे पर सख्ती, हर मोड़ पर चालान, और हर गलती पर तत्काल कार्रवाई। सुनने में यह व्यवस्था सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम लगता है, लेकिन सवाल यह है कि इस सख्ती के पीछे असल मंशा क्या है?

शहर के छोटे दुकानदारों, ठेला-खोमचा लगाने वालों और सड़क किनारे रोज़ी-रोटी कमाने वाले लोगों के लिए यह “मुस्तैदी” किसी आफत से कम नहीं।

नो पार्किंग के नाम पर गाड़ियों का चालान, अवैध वाहनों का संचालन पर सख्ती क्यों नहीं

ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त करना निस्संदेह ज़रूरी है, लेकिन जब यही व्यवस्था की मुस्तैदी अपनी स्वार्थ के आधार हो तो क्या मतलब ?

असलियत से कोसों दूर व्यवस्था को दुरुस्त करने निकले धुरंधर सिर्फ दिखावा है नहीं नो एंट्री में बड़ी-बड़ी गाड़ियां कभी प्रवेश न कर पाती और नहीं जाम के जंजाल से सड़क अपनी आंसू भी रहा होता! किसी भी व्यक्ति इलाके वाराणसी के चौराहे पर टी आई जरूर नजर आते हैं लेकिन आधे घंटे सिर्फ उनकी कार्यशैली देख लीजिए सब समझ आ जाएगा ! इनको लगता है कि हवा बड़ी करके सब ठीक कर लेंगे लेकिन सबसे पहले खुद को दुरुस्त करना होगा और ट्रैफिक नियमों का पालन करना होगा जिसके तहत अनैतिक संचालित गाड़ियों को सीज कर शहर से बाहर धकेलना होगा ! एक दिन दो दिन सख्ती से समाधान की और देखना समस्या निस्तारण नहीं बल्कि आंख मिचौली खेलना है !

बड़े-बड़े शोरूम के बाहर अवैध कब्जा के साथ-साथ बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियां खड़ी होती हैं लेकिन माइक लेकर और ट्रैफिक नियमों का पाठ पढ़ने वाले साहेब जुमला की रक्षा करते हैं वाराणसी के सिगरा रथ यात्रा क्षेत्र से लेकर आईपी मॉल तक सड़क के दोनों तरफ गाड़ियां खड़ी रहती हैं मजाल है कि कोई कानून का रखवाला इनको सख्ती दिखा सके सिर्फ खानापूर्ति कर रोज रोज कहानी बनाना आसान है लेकिन शहर और सड़क यातायात नियमों की परवाह करना बहुत ही कठिन !

असलियत यह है कि “व्यवस्था सुधार” के नाम पर एक नया खेल शुरू हो गया है—चालान का खेल, वसूली का खेल, और दबाव का खेल। नियमों की आड़ में आम आदमी को डराकर खड़ा कर देना और फिर उससे “समाधान” के नाम पर पैसे ऐंठना, यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब यह खुलेआम होता दिखता है। छोटे-छोटे दुकानदारों और ठेला पटरी संचालकों पर सर इनकी हंटर चलते देखा है लेकिन वही रसूखदार कानून का मजाक उड़ाते हैं !

अगर ट्रैफिक विभाग वाकई मुस्तैद है, तो यह मुस्तैदी सिर्फ कमजोर और छोटे लोगों पर ही क्यों?

बड़ी गाड़ियां, रसूखदार लोग और प्रभावशाली संस्थान—क्या उन पर भी उतनी ही सख्ती होती है? या फिर नियम सिर्फ आम जनता के लिए ही बनाए गए हैं?

ज़रूरत इस बात की है कि वाराणसी की यातायात व्यवस्था को सुधारने के साथ-साथ स्थानीय व्यापार और आम लोगों की आजीविका का भी ख्याल रखा जाए। सख्ती और संवेदनशीलता—दोनों का संतुलन ही असली प्रशासनिक कुशलता की पहचान होती है।

मुस्तैदी सड़क की व्यवस्था और लोगों की सुगम यातायात संचालन का मिश्रण है जहां नियम कानून प्रभावी से लागू कर सभी को सामान्य रूप से जीने का हक और अधिकार देता है ! 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *