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नेताजी का भौकाल vs छात्रों का भविष्य!-एग्जाम तो होते रहेंगे, पहले नेताजी का स्वागत देखिए!

बरेली/बदायूं | डिजिटल डेस्क

बरेली-बदायूं हाईवे पर बीजेपी के नवनियुक्त प्रदेश उपाध्यक्ष दुर्विजय सिंह शाक्य के भव्य स्वागत जुलूस के कारण शुक्रवार को कई किलोमीटर लंबा भयंकर जाम लग गया। इस वीवीआईपी (VVIP) जाम में फंसकर शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) देने जा रहे दर्जनों अभ्यर्थियों का पेपर छूट गया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

‘अमेरिका जैसी सड़कों’ पर राजा की तरह निकला काफिला

भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा दुर्विजय सिंह शाक्य को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद, कार्यकर्ताओं ने बरेली से बदायूं तक एक विशाल स्वागत रैली का आयोजन किया था। चश्मदीदों के मुताबिक, हाईवे पर गाड़ियों का एक लंबा और आलीशान काफिला ‘राजा’ की तरह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। जगह-जगह मंच बनाकर नेताजी का फूल-मालाओं और ढोल-नगाड़ों से स्वागत किया जा रहा था।

कार्यकर्ताओं के इस अति-उत्साह का नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में पूरा हाईवे पूरी तरह ठप हो गया।

सालों की मेहनत पर फिरा पानी, रोते दिखे अभ्यर्थी

एक तरफ जहां नेताजी के स्वागत में जश्न का माहौल था, वहीं दूसरी तरफ जाम में फंसे छात्र समय बीतता देख बिलख रहे थे। शनिवार को उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण TET परीक्षा थी। कई अभ्यर्थी परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने के लिए गाड़ियों से उतरे और पैदल ही दौड़ पड़े, लेकिन सख्त नियमों के कारण गेट बंद होने के बाद उन्हें प्रवेश नहीं मिला।

जाम में फंसी एक भावुक छात्रा ने कहा: “हम सालों से इस दिन के लिए रात-दिन पढ़ाई कर रहे थे। हमारे माता-पिता ने पेट काटकर फॉर्म की फीस भरी थी। लेकिन आज किसी नेता की रैली की वजह से हमारा पूरा साल बर्बाद हो गया। क्या हमारा भविष्य इन रैलियों से छोटा है?”

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तीखा व्यंग्य

इस घटना के बाद इंटरनेट पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। कई यूजर्स ने इसे ‘वीवीआईपी कल्चर का भद्दा प्रदर्शन’ करार दिया है। सोशल मीडिया पर एक तीखा और व्यंग्यात्मक नैरेटिव भी तेजी से वायरल हो रहा है:

“क्या देशहित में आप एक पेपर नहीं छोड़ सकते? नेता जी का स्वागत बार-बार थोड़े ही होगा, आपका पेपर तो अगले साल फिर हो जाएगा। थोड़ा सब्र कीजिए, देश का सोचिए!”

जनता का कहना है कि विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच जब ज़मीनी हकीकत ऐसी वीवीआईपी रैलियों से टकराती है, तो नुकसान हमेशा आम नागरिक और गरीब छात्रों का ही होता है।

बड़ी बहस: स्वागत ज़रूरी या छात्रों का भविष्य?

यह कोई पहली घटना नहीं है जब किसी राजनीतिक दल की रैली ने आम जनता की रफ्तार पर ब्रेक लगाया हो। लेकिन इस बार मामला सीधे तौर पर युवाओं के रोजगार और भविष्य से जुड़ा है। खबर लिखे जाने तक इस मामले पर प्रशासन या संबंधित राजनीतिक दल की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया था।

💬 आप क्या सोचते हैं?

क्या नेताओं के स्वागत और रैलियों के लिए रूट डायवर्जन या विशेष नियम नहीं होने चाहिए? क्या किसी रैली के लिए छात्रों का भविष्य दांव पर लगाना सही है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में दें और इस आवाज़ को उठाने के लिए आर्टिकल को शेयर करें।

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