कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻
पुलिस की नाकामी और आशीर्वाद से पैदा होते हैं जुआरी
वाराणसी के रोहनिया क्षेत्र में यदि अवैध जुए के कारोबार की चर्चाएं लगातार सामने आ रही हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी प्रश्न बन जाता है। जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक अवैध गतिविधियां फलती-फूलती दिखाई दें, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि आखिर इसके पीछे किसका संरक्षण है और कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।
स्थानीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं सुनने को मिलती हैं कि इस काले कारोबार से लाखों रुपये का लेन-देन होता है। तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन कुछ होता नहीं सिर्फ खानापूर्ति और दलालों के मदद से कमाने में जुटे है निगरानी के अधिकारी।
किसी भी अवैध धंधे का संरक्षण, चाहे वह किसी प्रभावशाली व्यक्ति, बिचौलिए या किसी अन्य के माध्यम से हो, समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।
सबसे अधिक चिंता तब होती है जब पत्रकारिता जैसे सम्मानित पेशे का नाम भी ऐसे मामलों में उछलने लगे। यदि कोई व्यक्ति पत्रकार होने का दावा कर अवैध गतिविधियों के लिए दलाली करता है या अपने प्रभाव का दुरुपयोग करता है, तो वह केवल कानून ही नहीं बल्कि पूरी पत्रकारिता की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाता है। ऐसे लोग समाज और मीडिया—दोनों के लिए कलंक हैं।
इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति स्वयं को समाजसेवी बताकर अपराधियों के लिए ढाल बनने का प्रयास करता है, तो वह समाज सेवा नहीं बल्कि समाज के साथ विश्वासघात करता है। वास्तविक समाजसेवी वह है जो अपराध के खिलाफ खड़ा हो, न कि अपराधियों के पक्ष में।
प्रशासन की जिम्मेदारी है कि यदि रोहनिया में अवैध जुए के संचालन, आर्थिक हेराफेरी या संरक्षण की कहानी जग जाहिर है तो उनकी निष्पक्ष जांच कर कठोर कार्रवाई किया जाए! जांच में जो भी दोषी पाया जाए—चाहे वह किसी भी पेशे, पद या प्रभाव का व्यक्ति हो—उसके विरुद्ध बिना किसी भेदभाव के कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए !
कानून का राज तभी स्थापित होगा जब अपराधी, उसके संरक्षक और प्रभाव का दुरुपयोग करने वाले सभी लोग समान रूप से कानून के दायरे में आएंगे। केवल चर्चाओं और आरोपों से नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर की गई निष्पक्ष कार्रवाई ही जनता का विश्वास मजबूत कर सकती है !!










