कृष्णा पंडित की कलम से ✍🏻
काशी में बाबा विश्वनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, करोड़ों सनातनियों की आस्था का केंद्र हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब श्रद्धालु बाबा के दरबार में आस्था लेकर पहुंचता है तो उसके सामने दर्शन से ज्यादा व्यवस्था, शुल्क, कतार, कथित दलाली और सुविधा के नाम पर अलग-अलग रास्तों की तस्वीर क्यों दिखाई देती है?
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की आधिकारिक व्यवस्था में सुगम दर्शन सहित विभिन्न पूजन-अनुष्ठानों के लिए निर्धारित शुल्क मौजूद हैं। सवाल शुल्क होने भर का नहीं, बल्कि व्यवस्था कितनी पारदर्शी और श्रद्धालु-केंद्रित है, इसका है।
सबसे बड़ा सवाल उन लोगों पर है जो बाबा के दर्शन को सुविधा बेचने का कारोबार बना देते हैं। मंदिर प्रशासन ने स्वयं सावधान किया है कि विशेष दर्शन के नाम पर पैसे मांगने या दुकान से प्रसाद लेने पर दर्शन कराने का दावा करने वालों से बचें।
तो फिर सवाल सीधा है—यदि मंदिर प्रशासन ऐसे दलालों से सावधान रहने की अपील कर रहा है, तो इनके खिलाफ स्थायी और प्रभावी कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है?
दुर्व्यवस्था का ठीकरा केवल श्रद्धालुओं के सिर पर फोड़कर व्यवस्था को पाक-साफ नहीं माना जा सकता। मंदिर प्रशासन, जिला प्रशासन और पुलिस—सभी की जिम्मेदारी है कि बाबा के दरबार में आने वाला श्रद्धालु बिना भय, भ्रम और अनावश्यक आर्थिक दबाव के दर्शन कर सके।
यह भी याद होगा कि पहले प्रोटोकॉल और वीआईपी दर्शन से जुड़े नियमों के उल्लंघन पर पुलिसकर्मी पर कार्रवाई और आर्थिक दंड तक की खबर सामने आ चुकी है।
यानी नियम हैं, व्यवस्था है और जिम्मेदारियां भी तय हैं—फिर सवाल उठता है कि जमीन पर हर श्रद्धालु को इसका समान लाभ क्यों नहीं मिलता?
सावन 2026 के लिए मंदिर प्रशासन ने वीआईपी और प्रोटोकॉल दर्शन बंद रखने तथा सभी को सामान्य कतार से दर्शन कराने की व्यवस्था घोषित की है। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन यह पालन हो रहा है नहीं असली परीक्षा यही है कि यह व्यवस्था केवल विशेष व्यक्ति तक सीमित रहती है जबकि आम लोगों के लिए भी दर्शन को दलाली और दुकानदारी से मुक्त रखा जाता है !
काशी की जनता और देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं का सवाल बिल्कुल साफ है—
बाबा विश्वनाथ के दरबार में आस्था बिकेगी या व्यवस्था सुधरेगी ?
दर्शन होगा या सुविधा के नाम पर सौदेबाजी चलेगी ?
और यदि दुर्व्यवस्था है, तो आखिर जिम्मेदार कौन है ?
बाबा के दरबार में श्रद्धा का मूल्य धन नहीं हो सकता। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें आम श्रद्धालु को यह महसूस न हो कि भगवान तक पहुंचने के लिए पहले किसी बिचौलिए या विशेष सुविधा का सहारा लेना पड़ेगा !
जरूरत है आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, जवाबदेही तय करने की
क्योंकि बाबा विश्वनाथ की नगरी में आस्था का सम्मान होना चाहिए—दुकानदारी का नहीं !!









