निर्दोष पत्रकार को अदालत से मिली जमानत, साजिश करने वाले अब कटघरे में!
पूर्वांचल राज्य संवाददाता मिर्जामुराद।
वाराणसी! जिले में जमीन हड़पने के लिए कानून का दुरुपयोग करने का एक बड़ा मामला सामने आया है। एक शिक्षित पत्रकार परिवार को फर्जी SC/ST मुकदमे में फंसाकर उनकी पुश्तैनी जमीन पर कब्जा करने की साजिश का अदालत में पर्दाफाश कर दिया गया है। वाराणसी की विशेष अदालत ने आरोपी पत्रकार पवन कुमार मिश्रा को जमानत दे दी गई है।
यह कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है, जहां कुछ लोग कानून की ताकत का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। मामला यह है कि वादी आकाश कुमार गौड़ ने पवन कुमार मिश्रा पर आरोप लगाया कि उन्होंने फेसबुक पर जातिसूचक गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दी।
लेकिन जब अदालत में मामले की परतें खुलीं, तो सच्चाई कुछ और ही निकली:
फेसबुक का झूठ: आरोपी पर आरोप था कि उसने 5 जनवरी 2025 को शाम 8 बजे फेसबुक लाइव किया था। अदालत के सामने जब सबूत रखे गए, तो पता चला कि उस समय कोई फेसबुक लाइव हुआ ही नहीं था। यह सरासर झूठ था।
जमीन पर कब्जे की नियत: असल में पूरा खेल जमीन हड़पने का था। पीड़ित पत्रकार का परिवार शिक्षित है और उनकी पुश्तैनी जमीन पर वादी के परिवार ने कब्जा कर रखा है जिसका विरोध करने पर इस प्रकार का साजिश और षड्यंत्र करके एक शिक्षित परिवार को फर्जी मुकदमों में बार-बार फसाया जा रहा है।
अपराधियों का रिकॉर्ड: जिस व्यक्ति ने केस दर्ज कराया, उसके भाई का खुद का अपराधिक इतिहास है। वह जिले का टॉप 10 गैंगस्टर हिस्ट्रीशीटर है, और पूर्व में पूरा परिवार हत्या के केस में जेल जा चुका है जिससे यह बात प्रमाणित होती है हत्या जैसा जघन्य अपराध करने वाला परिवार अपराधी प्रवृत्ति का ही हो सकता है और पहले भी परिवार के बहु , बेटियों साथ बदसलूकी कर चुका है।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि फर्जी SC/ST सर्टिफिकेट बनवाकर लोगों को डराना-धमकाना अब एक धंधा बन चुका है। ऐसे मामलों में अक्सर देखा जाता है कि पुलिस और प्रशासन दबाव में आकर बिना जांच-पड़ताल किए केस दर्ज कर लेती है।
पीड़ितों का आरोप है कि राजनीतिक दबाव के कारण अधिकारी ‘तमाशबीन’ बने हुए हैं, कारण है कि पत्रकार पवन कुमार मिश्रा के अधिवक्ता पिता के हत्यारे ((सन 2000 के दशक के कुख्यात अपराधी जिनके ऊपर रासुका, गैंगस्टर, गुंडा एक्ट, मिनी गुंडा एक्ट सभी संवैधानिक धाराओं में पाबंद किया गया था जो एक अधिवक्ता के हत्या के आरोप में 16 साल से जेल में बंद थे, अधिवक्ता की हत्या के केस में आजीवन कारावास तथा गैंगस्टर में 10 , 10 साल की सजा इन लोगों को हुआ था लेकिन अपने पैसे एवं अपने राजनीतिक संरक्षण के बल पर छूट गए)) 2 साल पहले जेल से छूटकर बाहर आ चुके हैं जो काफी पैसे वाले एवं उच्चस्तरीय राजनीतिक पकड़ वाले लोग हैं जिनका पूरा सपोर्ट इस आकाश कुमार एवं बजरंगी के परिवार तथा गांव के अपने कुछ हितेशियों के साथ है पैसा से लेकर हर प्रकार का सपोर्ट उन लोगों के द्वारा इन लोगों का सिर्फ इसलिए किया जाता है ताकि इन लोगों के साथ मिलकर मेरे परिवार को बर्बाद किया जा सके दुश्मनी निकाली जा सके।
क्या कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए निर्दोष को जेल भेज सकता है क्योंकि वह एक मजबूत जाति प्रमाण-पत्र का दुरुपयोग कर रहा है? प्रशासन की यह चुप्पी अपराधियों के हौसले बढ़ा रही है।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि मामले में जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का कोई साक्ष्य नहीं है और न ही घटना के समय पत्रकार वहां मौजूद था। अदालत ने पत्रकार पवन कुमार मिश्रा को 25,000 रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी।
यह फैसला केवल एक पत्रकार की जमानत नहीं है, बल्कि यह उन सभी परिवारों के लिए एक सबक है जो ऐसे फर्जी मुकदमों के डर में जी रहे हैं।
सवाल अब यह उठता है कि क्या प्रशासन फर्जी SC/ST सर्टिफिकेट बनाने वालों और कानून को खिलौना समझने वाले इन भू-माफियाओं पर कार्रवाई करेगा? या फिर सिस्टम इसी तरह ‘तमाशबीन’ बना रहेगा? आम जनता की नजर अब इस बात पर टिकी है कि फर्जी मुकदमा करने वालों पर पुलिस प्रशासन कब और क्या कार्रवाई करती है।
सावधान रहें: यदि आपके साथ भी ऐसा होता है, तो धैर्य न खोएं। अदालतें आज भी सत्य के साथ खड़ी हैं, बशर्ते आपके पास साक्ष्य ( सबूत) सही हों।










