Home / Uncategorized / चुनावी वैतरणी का ‘सदाबहार’ माध्यम बनी फरेंदा की गणेश शुगर मिल: छह महीने का लोकलुभावन विलाप और साढ़े चार साल की कुंभकर्णी नींद

चुनावी वैतरणी का ‘सदाबहार’ माध्यम बनी फरेंदा की गणेश शुगर मिल: छह महीने का लोकलुभावन विलाप और साढ़े चार साल की कुंभकर्णी नींद

पूर्वांचल राज्य ब्यूरो

महराजगंज।आनंद नगर लोकतंत्र की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जहाँ जनसरोकार से जुड़े गंभीर मुद्दों को साढ़े चार वर्षों तक व्यवस्था की बंद फाइलों में दफन रखा जाता है, वहीं चुनावी रणभेरी बजने के ठीक छह महीने पूर्व राजनेताओं की संवेदनाएं अचानक जाग उठती हैं। जनपद महराजगंज के आनंद नगर (फरेंदा) की ऐतिहासिक गणेश शुगर मिल इसका सबसे जीवंत और दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है। साढ़े चार साल तक गहरी ‘कुंभकर्णी नींद’ में सोने वाले हर राजनैतिक दल के जनप्रतिनिधियों को चुनाव नजदीक आते ही इस मिल के पुनरुद्धार की याद सताने लगती है। कसमों, वादों और घोषणाओं का ऐसा लोकलुभावन मायाजाल बुना जाता है जिससे क्षेत्र का भोला-भाला किसान और बेरोजगार युवा एक बार फिर उम्मीद लगा बैठता है। परंतु, चुनाव संपन्न होते ही जनभावनाओं से खिलवाड़ करने वाला यह ढर्रा पुनः अगले साढ़े चार साल के लिए मौन की चादर ओढ़ लेता है। औद्योगिक गौरव: जब यहाँ धड़कती थी पूर्वांचल की अर्थव्यवस्थाइस मिल का इतिहास क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि और औद्योगिक प्रगति का एक स्वर्णिम दस्तावेज रहा है:औद्योगिक आधारशिला: इस ऐतिहासिक चीनी मिल की स्थापना वर्ष 1932 में देश के प्रख्यात और दूरदर्शी उद्योगपति सेठ आनंदराम जैपुरिया द्वारा की गई थी।पेराई का कीर्तिमान: अपने चरमोत्कर्ष के दिनों में यह मिल 15,000 क्विंटल गन्ना प्रतिदिन पेराई करने की विशाल क्षमता रखती थी, जिसके कारण संपूर्ण क्षेत्र को ‘पूर्वांचल का चीनी का कटोरा’ कहा जाता था।स्वामित्व का हस्तांतरण: वर्ष 1988 तक निजी स्वामित्व में संचालित होने के बाद, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार इसे भारत सरकार के उपक्रम राष्ट्रीय वस्त्र निगम (NTC) के अधीन सौंप दिया गया।दुर्भाग्यपूर्ण तालाबंदी: प्रशासनिक अदूरदर्शिता, वित्तीय कुप्रबंधन और नीतिगत उदासीनता के चलते आखिरकार फरवरी 1994 में इस मिल के पहिए हमेशा के लिए थम गए। तीन दशकों का दंश: तीन लाख किसानों और श्रमिकों की टूटी रीढ़मिल के बंद होने से केवल एक कारखाना बंद नहीं हुआ, बल्कि पूरे क्षेत्र की रीढ़ पूरी तरह ध्वस्त हो गई:अन्नदाता की बेबसी: इस मिल पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर 3 लाख से अधिक गन्ना किसान रातों-रात बेसहारा हो गए। आज स्थिति यह है कि क्षेत्र के किसानों ने या तो गन्ने की खेती से तौबा कर ली है, या फिर वे भारी परिवहन लागत उठाकर दूर-दराज की मिलों को गन्ना औने-पौने दामों पर बेचने को विवश हैं।पलायन की विभीषिका: लगभग 10,000 स्थानीय युवाओं और कुशल श्रमिकों का रोजगार छिन जाने के कारण, आनंद नगर और आसपास के क्षेत्रों से दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे महानगरों की ओर भारी पलायन हुआ, जो आज तीन दशक बाद भी अनवरत जारी है।श्रमिकों का आर्तनाद: मिल बंद होने के बाद श्रमिकों का करोड़ों रुपये का वेतन और पीएफ फंड आज भी अधर में लटका हुआ है। कई वृद्ध श्रमिक अपने हक की कानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते इस दुनिया से विदा हो गए, परंतु उनकी गाढ़ी कमाई का भुगतान आज तक नहीं हो सका। वर्तमान प्रशासनिक परिदृश्य और कानूनी पेचदगियां७८१ एकड़ की बहुमूल्य संपदा: मिल के पास वर्तमान में 781 एकड़ की विशाल और बेशकीमती भूमि उपलब्ध है। इतनी बड़ी भूमि की उपलब्धता के बावजूद सरकारें यहाँ कोई नया उद्योग स्थापित करने में विफल रही हैं। उल्टे, इस भूमि पर भू-माफियाओं और अवैध अतिक्रमण की खबरें समय-समय पर प्रशासन के लिए सिरदर्द बनती रही हैं।सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल: विगत समय में मिल परिसर तब सुर्खियों में आया जब इसके लगभग ढाई दशक से बंद पड़े ‘स्ट्रॉन्ग रूम’ की सघन तलाशी के दौरान 13 प्राचीन असलहे (हथियार) बरामद हुए थे। इस घटना ने मिल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी थी। नेताओं के लिए ‘चुनावी संजीवनी’ बना यह मुद्दास्थानीय प्रबुद्ध वर्ग, किसान यूनियनों और ‘फरेंदा जिला बनाओ मंच’ का स्पष्ट आरोप है कि राजनीतिक दल जनभावनाओं के साथ केवल खिलवाड़ कर रहे हैं। पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान संसद या विधानसभा के पटल पर इस मुद्दे को महज औपचारिक तौर पर उठाया जाता है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस पैरवी नहीं की जाती।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रदेश और केंद्र सरकार मिलकर नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट (NSI) के तकनीकी दिशा-निर्देशों के आधार पर यहाँ आधुनिक एथेनॉल प्लांट (Ethanol Plant) या कोई वृहद कृषि-आधारित उद्योग स्थापित करें, तो न केवल महराजगंज बल्कि पड़ोसी जनपदों की भी तकदीर बदल सकती है। परंतु इसके लिए जिस ‘दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति’ की आवश्यकता है, वह चुनाव के ६ महीने पहले दिखने वाले खोखले दावों में कहीं नजर नहीं आती।निष्कर्ष: फरेंदा की गणेश शुगर मिल आज केवल ईंट-गारों का निर्जीव ढांचा नहीं, बल्कि क्षेत्र के लाखों लोगों की दफन हो चुकी उम्मीदों का प्रतीक बन चुकी है। आनंद नगर की प्रबुद्ध जनता अब जाग चुकी है और नेताओं के इस ६ महीने वाले चुनावी हथकंडे को इस बार सिरे से खारिज करने का मन बना चुकी है। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *