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जंतर-मंतर की तस्वीरें पूछ रही हैं—लोकतंत्र है या लाठी का राज?

कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻

जंतर-मंतर पर सामान्य वर्ग के प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की कथित धक्का-मुक्की, घसीटकर ले जाने और बल प्रयोग की तस्वीरें यदि वास्तविक घटनाक्रम को दर्शा रही हैं, तो यह बेहद गंभीर और असहज करने वाला दृश्य है। लोकतंत्र में नागरिक अपनी मांग लेकर सड़क पर उतरता है, तो उसका जवाब तर्क और संवाद होना चाहिए—दमन की तस्वीरें नहीं।

आखिर सवाल सीधा है—क्या शांतिपूर्ण विरोध की आवाज इतनी खतरनाक हो गई कि उसे सुनने के बजाय जमीन पर घसीटना जरूरी हो गया?

किसी भी वर्ग, जाति या समुदाय के नागरिकों को अपनी मांग रखने का संवैधानिक अधिकार है। यदि किसी प्रदर्शन में कानून का उल्लंघन हुआ था तो कार्रवाई का स्पष्ट कानूनी आधार सामने रखा जाना चाहिए। लेकिन यदि लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे थे, तो बल प्रयोग की जरूरत और अनुपात पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लोकतंत्र में पुलिस जनता की रक्षक होती है, सत्ता की नाराज़गी का हथियार नहीं

वर्दी की ताकत कानून से आती है, और कानून की ताकत संविधान से। इसलिए किसी भी कार्रवाई का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए कि क्या नागरिकों की गरिमा, वैधानिक अधिकार और निर्धारित प्रक्रिया का सम्मान हुआ या नहीं।

सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब किसी वर्ग को लगातार यह संदेश मिलने लगे कि उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। नाराजगी को दबाया जा सकता है, लेकिन सवालों को हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता। लाठी से भीड़ हटाई जा सकती है, विचार नहीं।

जंतर-मंतर की तस्वीरें प्रशासन के सामने सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रखतीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की परीक्षा भी लेती हैं। सरकार को तय करना होगा कि वह असहमति का जवाब संवाद से देगी या दमन की तस्वीरों से।

क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक की आवाज को कुचलना आसान हो सकता है, लेकिन उसके भीतर पैदा हुए अविश्वास को मिटाना बेहद मुश्किल।

सवाल आरक्षण का हो, अधिकार का हो या किसी नीति का—बहस होनी चाहिए, संवाद होना चाहिए

लेकिन लोकतंत्र के मंच पर नागरिक को घसीटते हुए ले जाने की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील व्यवस्था के लिए गर्व नहीं, आत्ममंथन का विषय होनी चाहिए।

आंदोलनकारीयों के साथ गुंडागर्दी और मारपीट कतई उचित नहीं है और यह सरकार जिस तरीके से निरंकुश और दमनकारी नीतियों के साथ लोगों के साथ खेल रही है वह आने वाले समय में भयावाह रूप लेकर वर्तमान सरकार के लिए सता भोग की अंतिम यात्रा होगा !!

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