असि घाट के संतोष पुजारी को हर साल राखी बांधने पहुंचती हैं ‘सूफी अलीशा’
संस्कृति और पारिवारिक संस्कार से हैं प्रभावित
पूर्वांचल राज्य वाराणसी। सात समंदर पार फिनलैंड से काशी तक पहुंची रिश्तों की डोर ने रक्षाबंधन पर भारतीय संस्कृति की खूबसूरती को एक बार फिर दुनिया के सामने रखा। फिनलैंड की रहने वाली सूफी अलीशा हर वर्ष रक्षाबंधन पर काशी आती हैं और वाराणसी के असि घाट, पुष्कर कुंड तालाब पर रामरामेश्वर मंदिर के पुजारी संतोष पुजारी को अपना भाई मानकर उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं।
विदेशी धरती से हजारों किलोमीटर का सफर तय कर निभाया जा रहा यह भाई-बहन का रिश्ता काशी में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
रक्षाबंधन के अवसर पर सूफी अलीशा ने संतोष पुजारी को विधि-विधान से राखी बांधी। माथे पर तिलक लगाया, आरती उतारी और भाई की सुख-समृद्धि एवं दीर्घायु की कामना की। इस दौरान दोनों के बीच भारतीय पारिवारिक परंपरा और संस्कारों की आत्मीय झलक देखने को मिली।
अलीशा सूफी बताती हैं कि भारतीय सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था उन्हें बेहद आकर्षित करती है। यहां रिश्ते केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और भावनाओं से जुड़े होते हैं। परिवार के किसी पर्व या उत्सव में दूर रहने वाले रिश्तेदार भी एक साथ जुटते हैं और खुशियां साझा करते हैं। यही अपनापन उन्हें भारत की ओर बार-बार खींच लाता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय विवाह परंपरा भी उन्हें बेहद प्रभावित करती है। यहां विवाह को केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों के पवित्र मिलन के रूप में देखा जाता है। बड़ों का सम्मान, रिश्तों की मर्यादा और परिवार को साथ लेकर चलने की परंपरा भारतीय संस्कृति की विशेष पहचान है।
फिनलैंड से काशी तक हर वर्ष निभाया जा रहा यह रिश्ता बताता है कि रिश्तों की कोई सीमा नहीं होती। प्रेम और विश्वास की डोर देश, भाषा और संस्कृति की सीमाओं से कहीं आगे होती है। रक्षाबंधन का यह अनूठा दृश्य काशी की धरती से भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के संदेश को भी साकार करता नजर आया।










