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खुलेआम सामान्य वर्ग की बहन बेटियों को मांगा जा रहा है और निर्लज्ज सत्ता की खामोशी क्यों?

कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻

अगर किसी सार्वजनिक मंच या राजनीतिक माहौल में सामान्य वर्ग की बहन-बेटियों के खिलाफ आपत्तिजनक, अशोभनीय या यौन प्रकृति की टिप्पणी किए जाने के आरोप सामने आते हैं, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि कानून के राज और महिलाओं की गरिमा का है ! किसके शहर और इशारे पर सामान्य वर्ग की बहन बेटियों को मांगा जा रहा है खुलेआम सोशल मीडिया मंच पर भी यह आपत्तिजनक और सामाजिक और असंवैधानिक बात करने वालों की बाढ़ आ गई है जो संविधान की आड़ में समाज और बहन बेटियों की अस्मिता के साथ खेल रहे हैं यदि उनके साथ सामान्य वर्ग खेलने लगा तो भारत में क्या विश्व के किसी कोने में छिपने का जगह नहीं मिलेगा !

आखिर यह कौन-सा नियम, कानून और राजनीतिक दायरा है, जिसमें किसी महिला की अस्मिता को निशाना बनाने वाले कथित बयान पर कार्रवाई के बजाय चुप्पी दिखाई देती है?

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण की बात करता है

और यदि मामला यौन उत्पीड़न या आपत्तिजनक यौन व्यवहार की कानूनी श्रेणी में आता है, तो कानून में उसकी शिकायत और निवारण के प्रावधान भी मौजूद हैं।

फिर सवाल सीधा है—किसके दबाव में खामोशी है? किसके प्रभाव में कार्रवाई ठंडी है?

प्रधानमंत्री से लेकर संबंधित प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व तक यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि महिलाओं की गरिमा पर चोट करने वाले किसी भी कथित कृत्य की निष्पक्ष जांच क्यों न हो?

न्याय व्यवस्था से भी जनता की अपेक्षा यही है कि न आरोपी को राजनीतिक संरक्षण मिले, न पीड़ित की आवाज दबे और न कानून किसी जाति या राजनीतिक पहचान देखकर अपना रास्ता बदले।

यह एक जगह नहीं एक प्रदेश में नहीं कई जगह सुनने को मिल रहा है और सोशल मीडिया पर नीलांड गैंग अब सरेआम लिख रहा है वही दूसरी तरफ जाति प्रमाण पत्र लेने वाले को गलती से कोई उनकी जाति पर टिप्पणी कर दिया तो तत्काल प्रभाव से एसटी एससी एक्ट में मुकदमा कायम कर कानून का दुरुपयोग और खुले में मखौल उड़ाया जा रहा है ! ज्यादातर मामले में देखा जा रहा है कि सरकार की चुप्पी अब सामान्य वर्ग के लोगों को खटकने लगा है और उनके मन में सरकार के प्रति नफरत और अपराध की बीज उफान रहा है फिर वही बात दोहराई जाएगी जो कानून से ऊपर और हटकर होगा ना स्वस्थ भारत के लिए सामाजिक व्यवस्था दुरुस्त रखने के लिए ठीक होगा !!
कानून सबके लिए बराबर है—यही लोकतंत्र की असली पहचान है।
न्याय चाहिए, संरक्षण नहीं; जांच चाहिए, राजनीतिक चुप्पी नहीं !!

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