पूर्वांचल राज्य ब्यूरो
महराजगंज / घुघली
संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार, हिंदुस्तान अकादमी, सिटीजन फोरम तथा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं बौद्ध दर्शन और साहित्य (संस्कृति और पाली भाषा के विशेष संदर्भ में)” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन विचारोत्तेजक उद्बोधनों के साथ संपन्न हुआ।
समापन सत्र की अध्यक्षता लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने की। उन्होंने भगवान गौतम बुद्ध को विश्व का पहला मानवतावादी चिंतक बताते हुए कहा कि बुद्ध ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्य बिहार की यात्रा कर अपने दर्शन को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। उन्होंने कहा कि बुद्ध का चिंतन करुणा, तर्क और मानव कल्याण पर आधारित था, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
सारस्वत अतिथि लखनऊ के न्यायाधीश शिवेंद्र मिश्रा ने अपने शाश्वत उद्बोधन में कहा, “तक्षशिला का विध्वंस शस्त्र का रास्ता है, शास्त्र का नहीं।” उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और साहित्य की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए ज्ञान की शक्ति को समाज के उत्थान का आधार बताया।
विशिष्ट वक्ता पूज्य भंते चंद्रिमा महाथेरो (सारनाथ) ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में ऋषि-मुनियों के विचार जनकल्याण से संबद्ध रहे हैं। आश्रम व्यवस्था, पुरुषार्थ और संस्कार भारतीय जीवन शैली को जीवंत बनाते हैं। उन्होंने सहजीविता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए भगवान राम के पशु-पक्षियों से संवाद का उदाहरण दिया, जो भारतीय परंपरा के उच्च भाषा-बोध और संवेदनशीलता को दर्शाता है।
आचार्य तिवारी ने कहा कि बुद्ध को सर्वाधिक सम्मान सनातन मतावलंबियों ने दिया, जिन्होंने आत्मा और ईश्वर को न मानने वाले चिंतक को भी अपना अवतार स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि अहिंसा, तृष्णा का त्याग और अष्टांगिक मार्ग की शिक्षाएं सनातन मूल्यों से अभिन्न रूप से जुड़ी हैं।
प्रबंधक डॉ. बलराम भट्ट ने भारतीय ज्ञान परंपरा को जनकल्याण की आधारशिला बताते हुए कहा कि यह परंपरा सहअस्तित्व और समरसता का संदेश देती है। कार्यक्रम के प्राचार्य डॉ. अजय कुमार मिश्रा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा प्रतीक चिन्ह व अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। हिंदी विभाग प्रभारी डॉ. राणा प्रताप तिवारी ने सेमिनार की विस्तृत आख्या प्रस्तुत की।
तकनीकी सत्र में 40 शोध पत्रों का वाचन
संगोष्ठी के दूसरे दिन आयोजित तकनीकी सत्र में कुल 40 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें ऑफलाइन एवं ऑनलाइन दोनों माध्यम शामिल रहे। विभिन्न विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा और बौद्ध दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता पर गहन विचार रखे।
संदर्भ वक्ताओं ने कहा कि आज के दौर में बुद्ध का दर्शन केवल एक ऐतिहासिक विचारधारा नहीं, बल्कि एक जीवन शैली के रूप में उभर रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में बौद्ध चिंतन सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ कर रहा है।
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा और बौद्ध दर्शन आज भी समाज को दिशा देने में सक्षम हैं। ज्ञान, करुणा और अहिंसा का मार्ग ही मानवता के उज्ज्वल भविष्य का आधार बन सकता है।










