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सेवा के मंदिर में अगर सौदे की बू आए, तो समाज को चुप नहीं रहना चाहिए

कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻

सेवा के नाम पर मोटी वसूली, दान की आड़ में व्यावसायिक मुनाफा, और मरीजों की मजबूरी का हिसाब-किताब

वाराणसी। जिस संस्था की नींव त्याग, करुणा और मानव सेवा पर रखी गई हो, अगर वहीं पीड़ा का बाज़ार सजने लगे तो सवाल उठना लाज़िमी है। रामकृष्ण मिशन सेवा आश्रम, जिसे कभी गरीबों की आशा का केंद्र कहा जाता था, आज स्थानीय स्तर पर कठघरे में खड़ा है। आरोप सीधे हैं और तीखे भी—सेवा के नाम पर मोटी वसूली, दान की आड़ में व्यावसायिक मुनाफा, और मरीजों की मजबूरी का हिसाब-किताब।

विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि इलाज, जांच और दवाओं के शुल्क ऐसे तय किए गए हैं मानो यह कोई कॉरपोरेट अस्पताल हो, न कि सेवा का आश्रम। जो दरवाज़ा दया और सहारे के लिए खुलना चाहिए था, वह अब पर्ची और भुगतान की रसीदों से मापा जा रहा है।
जिस तरीके से यहां पर व्यवस्था संचालित हो रही है वह लूटतंत्र का काम है !
सबसे कड़वा सवाल यह है—क्या सेवा अब ‘पैकेज’ में मिलने लगी है? क्या दान और धर्म के नाम पर चलने वाले संस्थान भी वही राह पकड़ चुके हैं, जहाँ इंसान से पहले बिल खड़ा होता है? ज्यादातर जांच जो महंगी होती है सब निजी संस्थाओं को मरीज भेज दिया जाता है और फिर वहां जांच के नाम पर धंधा जिसकी जानकारी रामकृष्ण मिशन अर्थात कौड़िया अस्पताल लक्सा वाराणसी के महाराज को भी है सिर्फ महाराज नाम से ही कोई महाराज नहीं होता भगवा वस्त्र धारण कर टोपी पहन लेना और भेदभाव के साथ लोगों की सेवा सिर्फ मात्र ढकोसला ही इनका काम है और तो और यह जाति और धर्म देखकर भी सेवा दे रहे हैं जिसकी कई शिकायतें मिल चुकी हैं फिर भी ट्रस्ट की वजह से इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती जबकि यदि सही से जांच करा दिया जाए तो पता चलेगा कि यह तो लूट का अड्डा है जहां सेवा के नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है !

संस्थान की ओर से तर्क दिए जाते हैं—आधुनिक चिकित्सा, बढ़ती लागत, विशेषज्ञ डॉक्टर, पर जनता का पलटवार है—अगर मॉडल पूरी तरह व्यावसायिक है, तो फिर “सेवा” शब्द का इस्तेमाल क्यों ?

शहर के गणमान्य लोगों का कहना है कि यदि निजी अस्पताल के तौर पर वसूली ही करना है तो फिर ‘सेवा आश्रम’ शब्द क्यों ? सीधे-सीधे इसे निजी अस्पताल घोषित कर दिया जाए। कम से कम भ्रम तो नहीं रहेगा। कई लोगों ने यहाँ मनमानी का भी आरोप लगाया है !! 

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