पूर्वांचल राज्य ब्यूरो
बलिया। जन नायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध टी डी कालेज बलिया के कृषि संकाय के कृषि क्षेत्र में हुए एक महत्वपूर्ण शोध ने खरपतवारों को किसानों के लिए समस्या के बजाय समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है। कृषि रसायन एवं मृदा विज्ञान विभाग के शोधार्थी संदीप कुमार गुप्ता ने प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह के मार्गदर्शन में सूरजमुखी की खेती पर अपना पीएचडी शोध सफलतापूर्वक पूरा किया है। यह शोध टिकाऊ कृषि की दिशा में नई उम्मीद जगाता है। इस अध्ययन में बलिया की जलोढ़ मिट्टी में सूरजमुखी की फसल पर विभिन्न जैविक और अकार्बनिक उर्वरकों के प्रभावों का गहन विश्लेषण किया गया। शोध के दौरान गोबर की खाद, मुर्गी फार्म की लीद, कम्पोस्ट, बायोचार, धान का पुआल, जलकुंभी और पार्थेनियम (डिस्को घास) जैसे जैविक पदार्थों को बुवाई से पहले मिट्टी में मिलाकर उनके प्रभावों का परीक्षण किया गया। शोध के निष्कर्षों से पता चला कि जैविक और अकार्बनिक उर्वरकों के संयुक्त उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।इसके साथ ही, मिट्टी के कार्बन अंशों में सुधार आया और सूरजमुखी की पैदावार तथा गुणवत्ता दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जलकुंभी और पार्थेनियम जैसे खरपतवारों का हरे रूप में 5 टन प्रति बीघा की दर से बुवाई से 20-25 दिन पूर्व खेत में प्रयोग करने से न केवल फसल उत्पादन में वृद्धि हुई, बल्कि इन हानिकारक खरपतवारों से भी मुक्ति मिली। इस नवीन विधि से खेती की लागत में कमी आई है और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिला है। शोध ने यह भी सिद्ध किया है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग करके किसान टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती कर सकते हैं। यह शोध केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि किसानों के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शन भी प्रदान करता है। स्थानीय कृषि विशेषज्ञों और किसानों ने इस नवाचार की सराहना करते हुए इसे कृषि क्षेत्र में एक परिवर्तनकारी कदम बताया है।
खरपतवार अब बनेंगे खाद कृषि शोध से टिकाऊ खेती का नया रास्ता, उपज में भी इजाफा डॉ. अशोक सिंह बोले-










