अमित पाठक अपनी कलम से ✍️
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत विचार नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है जो आज के समाज में अक्सर उलझ जाती है अंधविश्वास और आस्था के बीच की महीन रेखा।
आज जब समाज का एक बड़ा वर्ग परंपराओं और मान्यताओं को अंधविश्वास कहकर खारिज कर देता है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इन्हीं मान्यताओं के नाम पर भ्रम और भय का वातावरण भी बना देते हैं। ऐसे समय में मुख्यमंत्री का यह स्पष्ट कहना कि “मैं अंधविश्वासी नहीं, आस्था में विश्वास करता हूं”, एक संतुलित संदेश देता है।
आस्था वह शक्ति है जो व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। यह विश्वास का आधार है, जो कठिन परिस्थितियों में भी इंसान को संभाले रखता है। लेकिन जब यही आस्था तर्कहीन डर, अफवाह और भ्रम का रूप ले लेती है, तब वह अंधविश्वास बन जाती है, जो समाज के विकास में बाधा उत्पन्न करती है।
मुख्यमंत्री ने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और हर स्तर पर निगरानी की बात कही है, जो यह दर्शाता है कि शासन अब केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि व्यवस्था और जवाबदेही से भी चल रहा है। यह संदेश उन लोगों के लिए भी है जो बिना तथ्य के आरोप लगाते हैं या भ्रम फैलाने की कोशिश करते हैं।
उत्तर प्रदेश की छवि को बदलने की बात हो या नोएडा जैसे स्थानों को लेकर पुरानी धारणाओं को तोड़ने की सरकार अब मानसिकता बदलने की दिशा में भी काम करती दिख रही है। जहां पहले डर और अंधविश्वास हावी थे, वहां अब विकास और निवेश की बात हो रही है।
समाज को भी यह समझना होगा कि आस्था निजी होती है, लेकिन अंधविश्वास सामाजिक नुकसान करता है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी परंपराओं का सम्मान करें, लेकिन तर्क और सत्य के आधार पर आगे बढ़ें।
अंततः, यह बयान एक संदेश है
विश्वास रखें, लेकिन आंखें बंद करके नहीं।










