एपिसोड- 1
अमित पाठक अपनी कलम से ✍️
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए । खासकर एम्बुलेंस सेवा, जो जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे अहम कड़ी होती है, उस पर विशेष निगरानी और पारदर्शिता अनिवार्य है। लेकिन वर्तमान हालात कुछ और ही तस्वीर बयां कर रहे हैं ।
आज स्थिति यह है कि एम्बुलेंस सेवा पर भारी भरकम बजट खर्च किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अक्सर सवालों के घेरे में खड़ी नजर आती है । कई जगहों पर एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंचती, तो कहीं तकनीकी खामियों या लापरवाही की शिकायतें सामने आती हैं । इससे साफ प्रतीत होता है कि इस सेवा में कहीं न कहीं बड़ी चूक या फिर जानबूझकर की जा रही अनदेखी मौजूद है ।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री स्वयं उपमुख्यमंत्री के पद पर आसीन हैं , तो फिर इस महत्वपूर्ण सेवा पर उनकी सीधी निगरानी क्यों नहीं दिखाई देती ? क्या उन्हें इस व्यवस्था की खामियों की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं ?
यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि एम्बुलेंस सेवा की गहन और निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो बजट में हो रहे अनावश्यक खर्च पर बड़ा अंकुश लगाया जा सकता है । इससे न केवल सरकारी धन की बचत होगी, बल्कि उस धन का उपयोग स्वास्थ्य व्यवस्था को और बेहतर बनाने में किया जा सकता है जैसे अस्पतालों में सुविधाओं का विस्तार, दवाइयों की उपलब्धता या ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करना ।
आज जरूरत इस बात की है कि एम्बुलेंस सेवा को केवल कागजों में नहीं , बल्कि वास्तविकता में भी प्रभावी बनाया जाए । इसके लिए जवाबदेही तय हो, निगरानी तंत्र मजबूत हो और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई हो । जनता ने सरकार को भरोसे के साथ चुना है, और अब यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह उस भरोसे को कायम रखे। एम्बुलेंस जैसी जीवन रक्षक सेवा में लापरवाही या धांधली किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए ।
अगर समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या और गहरी होती जाएगी और इसकी कीमत आम जनता को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी ।









