राजीव शंकर चतुर्वेदी
पूर्वांचल राज्य ब्यूरो
बलिया। अंबेडकर को पूजने की नहीं पढ़ने की जरूरत है। अंबेडकर को जानने के लिए उनको पूजने से ज्यादा जरूरी है उनको पढ़ना। अंबेडकर ने सामाजिक समरसता के लिए जो प्रयास किया वह भारतीय समाज के लिए आज भी अनुकरणीय है। अम्बेडकर को एक अर्थशास्त्री के रूप में संविधान निर्माता के रूप में भी याद करना चाहिए। उक्त विचार जनपद के वरिष्ठ कवि और आलोचक रामजी तिवारी ने अंबेडकर जयंती के अवसर पर संकल्प संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता कहीं। सतीश चंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के इतिहास विभाग के प्रोफेसर शुभनीत कौशिक ने कहा की अंबेडकर के विचारों को युवा पीढ़ी को जानना और समझना चाहिए। उनके विचार भारतीय समाज के लिए एक नई दिशा देते हैं। आज की युवा पीढ़ी अंबेडकर को पढ़ना नहीं चाहती बल्कि सतही ज्ञान के आधार पर उनका मूल्यांकन करती है। संविधान के निर्माण में उनके महत्वपूर्ण योगदान को तो हम सब जानते हैं। उनके जीवन संघर्षों के बारे में जानने की जरूरत है। अगले वक्ता कुंवर सिंह पीजी कॉलेज के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर विमल कुमार यादव जी ने कहा कि अंबेडकर कबीर और पेरियार से प्रभावित होते हैं और एक समता मूलक समाज के लिए अपना पूरा जीवन खपा देते हैं। आज अंबेडकर के विचार पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो गये हैं। अंबेडकर ने कहा था कि संविधान चाहे जितना अच्छा हो उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो उस संविधान का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। आज भारतीय समाज में संवैधानिक मूल्यों पर चर्चा होनी चाहिए। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में जम्मू से पधारे लकी जी गुप्ता का एकल नाट्य मंचन ” मां मुझे टैगोर बना दे की प्रस्तुति हुई” थिएटर इन एजुकेशन प्रोग्राम के अंतर्गत इस नाटक की प्रस्तुति जनपद के कई स्कूलों और कॉलेज में होनी है। मंगलवार को अंबेडकर जयंती के अवसर पर संकल्प संस्था के अमृत पाली स्थित कैम्प कार्यालय में इस नाटक की 1817 वीं प्रस्तुति हुई। प्रस्तुति देख लोग भावुक हो गये। यह नाटक एक स्टुडेंट्स के साथ अभिभावक और टीचर को बहुत ही मार्मिक तरीके से अपना कर्तव्य बोध कराता है। नाटक की विशेषता है कि प्रस्तुति के दौरान दर्शक भी नाटक के एक पात्र बन जाते हैं। देश के सभी राज्यों के लगभग चार सौ शहरों में इसकी प्रस्तुति हो चुकी है। संकल्प के सचिव आशीष त्रिवेदी ने बताया कि इस प्रस्तुति को कराने के पीछे मकसद यह है कि बच्चों को बताया जाए कि रंगमंच हमारे जीवन को कितना और किस तरीके से प्रभावित करता है। शिक्षा में रंगमंच का प्रयोग किया जाए तो गुणात्मक परिवर्तन आ सकता है। कार्यक्रम का संचालन आशीष त्रिवेदी ने किया जबकि रंगकर्मी ट्विंकल गुप्ता ने आभार व्यक्त किया।
अंबेडकर को पूजने की नहीं पढ़ने की जरूरत है: रामजी तिवारी










