2023 और 2025 की विनाशकारी बाढ़ के बाद जल संसाधन विभाग का व्यापक अभियान, रावी की जलधारण क्षमता बढ़ाने पर विशेष जोर
अमृतसर, 06 जुलाई – (राजू वालिया) – वर्ष 2023 और 2025 में पंजाब में आई विनाशकारी बाढ़ से हुए भारी जान-माल के नुकसान के बाद पंजाब सरकार का जल संसाधन विभाग भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचाव के लिए बड़े स्तर पर कार्य कर रहा है। इसी कड़ी में अमृतसर जिले के धर्मकोट घोणेवाल कॉम्प्लेक्स में रावी नदी की वैज्ञानिक पद्धति से डी-सिल्टिंग (गाद एवं मलबा हटाने) का कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। विभाग का उद्देश्य नदी की जल वहन क्षमता को बढ़ाना, पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना तथा सीमावर्ती क्षेत्रों को संभावित बाढ़ के खतरे से सुरक्षित बनाना है। जल संसाधन विभाग, अमृतसर के कार्यकारी अभियंता (एक्सईएन) विश्वपाल गोयल ने बताया कि वर्ष 2023 और 2025 के दौरान सतलुज, ब्यास तथा रावी नदियों में आई भीषण बाढ़ के कारण पंजाब को अभूतपूर्व नुकसान उठाना पड़ा। बाढ़ के दौरान 91 स्थानों पर तटबंध टूट गए, नदी सुरक्षा एवं जल निकासी संबंधी ढांचे क्षतिग्रस्त हो गए तथा 86 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि प्रभावित हुई। इन प्राकृतिक आपदाओं से राज्य को लगभग 1,825.46 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जबकि क्षतिग्रस्त ढांचे के पुनर्निर्माण एवं स्थायी समाधान के लिए करीब 11,855.65 करोड़ रुपये की आवश्यकता आंकी गई है। विश्वपाल गोयल ने बताया कि समय के साथ नदी में गाद, रेत एवं अन्य मलबा जमा होने से उसकी जल निकासी क्षमता कम हो जाती है। परिणामस्वरूप वर्षा अथवा अधिक जल प्रवाह के समय पानी लंबे समय तक नदी में ठहर जाता है और बाढ़ की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। इसी समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिक ढंग से डी-सिल्टिंग की जा रही है ताकि नदी का प्राकृतिक प्रवाह सुचारु रूप से बहाल किया जा सके। उन्होंने बताया कि धर्मकोट घोणेवाल कॉम्प्लेक्स में चिन्हित स्थानों पर आधुनिक तकनीक और भारी मशीनों की सहायता से डी-सिल्टिंग का कार्य लगातार चल रहा है। इससे नदी में जल प्रवाह की बाधाएं दूर होंगी, अतिरिक्त पानी की निकासी सुचारु होगी तथा भविष्य में बाढ़ के दौरान आसपास के गांवों और किसानों को राहत मिलेगी। एक्सईएन विश्वपाल गोयल ने बताया कि पिछले वर्ष मानसून के दौरान रावी नदी ने अमृतसर जिले में 23 स्थानों पर तटबंध तोड़ दिए, जिससे 198 गांव सीधे प्रभावित हुए। इस भीषण बाढ़ के दौरान 10 लोगों की मृत्यु हुई, जबकि 307 पशुओं की भी जान चली गई। इसके अलावा लगभग 59,793 एकड़ कृषि भूमि की फसल पूरी तरह नष्ट हो गई, जिससे हजारों किसानों को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।उन्होंने बताया कि केवल धर्मकोट घोणेवाल कॉम्प्लेक्स में ही तटबंध छह स्थानों से टूट गए थे। बाढ़ का पानी उतरने के बाद नदी तल में भारी मात्रा में गाद और रिवर बेड मैटेरियल (आरबीएम) जमा हो गया, जिससे नदी की प्राकृतिक धारा बाधित हो गई और उसकी जल वहन क्षमता में भारी कमी आ गई। विश्वपाल गोयल ने बताया कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए विभाग द्वारा पूरे क्षेत्र का विस्तृत तकनीकी सर्वेक्षण कराया गया। सर्वे के दौरान नदी के उन स्थानों की पहचान की गई, जहां गाद और मलबे के कारण जल प्रवाह प्रभावित हो रहा था। इसके आधार पर भारत सरकार द्वारा जारी नेशनल फ्रेमवर्क फॉर सेडिमेंट मैनेजमेंट (एनएफएसएम) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की गई। इस परियोजना को राज्य सरकार तथा भारत सरकार के इंजीनियरिंग विशेषज्ञों की संयुक्त स्टेट टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी (एसटीएसी) द्वारा तकनीकी स्वीकृति भी प्रदान की जा चुकी है।उन्होंने बताया कि पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी एवं नियमबद्ध बनाए रखने के लिए डी-सिल्टिंग का कार्य की-होल मार्कअप लैंग्वेज (केएमएल) आधारित डिजिटल जियो-फेंसिंग प्रणाली के माध्यम से किया जा रहा है। विभागीय अधिकारी प्रत्येक चरण की लगातार निगरानी कर रहे हैं ताकि कार्य केवल स्वीकृत क्षेत्र में ही किया जाए और किसी प्रकार की अनियमितता की संभावना न रहे कार्यकारी अभियंता ने बताया कि डी-सिल्टिंग के दौरान निकाली जा रही गाद एवं अन्य सामग्री को सुरक्षित स्थानों पर संग्रहित किया जा रहा है। भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर इसी सामग्री का उपयोग कमजोर तटबंधों को मजबूत करने, आपातकालीन स्थिति में रेत के बैग भरने तथा बाढ़ नियंत्रण संबंधी अन्य कार्यों में किया जाएगा। इससे आपदा की स्थिति में त्वरित कार्रवाई करना आसान होगा और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। मानसून से पहले कार्य पूरा करने का लक्ष्य विश्वपाल गोयल ने कहा कि जल संसाधन विभाग अमृतसर और गुरदासपुर जिलों के लोगों के जीवन, कृषि और आजीविका की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। विभाग का प्रयास है कि मानसून के चरम दौर से पहले धर्मकोट घोणेवाल कॉम्प्लेक्स में डी-सिल्टिंग का कार्य निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा कर लिया जाए। उन्होंने कहा कि भारी मशीनरी की सहायता से नदी की प्राकृतिक जल प्रवाह क्षमता को पुनः स्थापित किया जा रहा है तथा पूरे कार्य की नियमित निगरानी की जा रही है। विभाग को विश्वास है कि इस वैज्ञानिक पहल से भविष्य में बाढ़ के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकेगा और सीमावर्ती क्षेत्रों के हजारों परिवारों, किसानों तथा उनकी फसलों को बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी।










