कृष्णा पंडित की कलम से✍🏻
उत्तर प्रदेश में पुलिसिंग का नया पैमाना शायद अब अपराध नियंत्रण नहीं, कैमरे के सामने प्रदर्शन बनता जा रहा है। वर्दी पहनकर रील बनाइए, संवाद बोलिए, कैमरे में दमदार अंदाज दिखाइए और फिर सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटिए—लेकिन थाने की चौखट पर खड़े उस आम आदमी का क्या, जो न्याय के लिए महीनों चक्कर काट रहा है ?
जनता पूछ रही है—रील खत्म होने के बाद असली काम कब शुरू होगा?
आई पी एस अधिकारियों द्वारा सिर्फ खानापूर्ति और जिले में हवाबाज़ी से समस्या का हो रहा समाधान
जुआ, सट्टा, चोरी और देहव्यापार जैसी दूसरे अपराधों को लेकर जब शिकायतें लगातार उठती हैं, तो सवाल केवल अपराधियों का नहीं रहता—सवाल पुलिस की जवाबदेही का भी बन जाता है। कहीं कार्रवाई पर सवाल, कहीं कार्रवाई न होने पर सवाल और कहीं पुलिसिया दावों की विश्वसनीयता पर सवाल….?
सबसे गंभीर चिंता उन शिकायतों की है जिनमें फर्जी मुकदमों, मनमानी कार्रवाई या पक्षपात के आरोप लगाए जाते हैं। कानून की ताकत अगर निर्दोष को डराने लगे और वास्तविक अपराधी कानून से आंख-मिचौली खेलने लगे, तो फिर जनता का भरोसा किस पर बचेगा? आईजीआरएस पर कंप्लेंट और मुकदमों में अधिकारियों द्वारा लगाई जा रही रिपोर्ट पूरी तरीके से मनमानी और आधारहीन होती है ! यह कोई नया मामला नहीं ज्यादातर मामले में यही पैमाना तय हो चुका है और साहेब आंख पर पट्टी बांध अपने महीने की इनकम और कमाई का जरिया तलाशते हुए कानून का परचम लहरा रहे हैं !
आसमानी खुलासे और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी गहरी खाई बन चुकी है
पुलिस का काम वायरल होना नहीं,
विश्वास पैदा करना है। पुलिस का काम कैमरे के सामने हीरो बनना नहीं, कानून के सामने सबको बराबर खड़ा करना है।
पुलिस का काम सोशल मीडिया पर तालियां बटोरना नहीं
पीड़ित की आंखों में भरोसा लौटाना है
क्योंकि अपराध पर कार्रवाई की खबर तब सार्थक है जब वह रिकॉर्ड, सबूत और न्यायिक कसौटी पर खरी उतरे
सिर्फ प्रेस नोट और सोशल मीडिया पोस्ट से कानून-व्यवस्था मजबूत नहीं होती
और याद रखिए—
वर्दी जनता से बड़ी नहीं है।
वर्दी संविधान की जिम्मेदारी है।
इसलिए सवाल पूछना जनता का अधिकार है और जवाब देना व्यवस्था की जिम्मेदारी।
लेकिन जब थाने में कोई गरीब न्याय मांगकर आए, तब कैमरा नहीं—कानून चलना चाहिए।
क्योंकि जनता को इंस्टाग्राम वाली पुलिस नहीं,
अपने अधिकारों की रक्षा करने वाली पुलिस चाहिए !
रील के व्यूज कुछ घंटों में खत्म हो जाते हैं,
लेकिन अन्याय का दर्द वर्षों तक याद रहता है
(कृष्णा पंडित)✍🏻 फिर किसी विशेष स्टोरी के साथ…










