कृष्णा पंडित की कलम से
सवाल सीधा है—जब हर साल बारिश होती है तो हर साल जलभराव क्यों होता है?
विरासत के नाम पर इतराती काशी, विकास के नाम पर किए जा रहे दावों और बारिश के पानी में डूबी सड़कों के बीच आज खुद एक बड़ा सवाल बनकर खड़ी है—आखिर यह कैसा विकास है, जो चंद घंटों की बारिश में पानी-पानी हो जाता है?
काशी को स्मार्ट सिटी बनाने के दावे हैं, करोड़ों की योजनाएं हैं, बड़ी-बड़ी घोषणाएं हैं, चमकते हुए विकास के पोस्टर हैं; लेकिन बारिश होते ही इन दावों की पोल सड़क पर बहते पानी के साथ खुल जाती है। चारों तरफ जलजमाव, उफनते नाले, ध्वस्त यातायात और परेशान जनता—यही है आज विकास की जमीन पर दिखाई देती तस्वीर।
सवाल सीधा है—जब हर साल बारिश होती है तो हर साल जलभराव क्यों होता है? जब नालों की सफाई के नाम पर बजट खर्च होता है तो पानी निकलता क्यों नहीं? जब सीवर और ड्रेनेज सिस्टम को आधुनिक बनाने के दावे किए जाते हैं तो पहली तेज बारिश में व्यवस्था घुटनों के बल क्यों बैठ जाती है?
क्या विकास केवल पत्थर लगाने, सड़क खोदने और फिर सड़क बनाने का नाम है? क्या स्मार्ट सिटी का मतलब यह है कि शहर की सड़कें बारिश में स्मार्ट तरीके से तालाब बन जाएं?
काशी की गलियों में आम आदमी पानी में रास्ता तलाश रहा है और जिम्मेदार तंत्र शायद फाइलों में समाधान तलाश रहा है। जनता को हर बारिश में जलभराव की सजा और प्रशासन को हर बार निरीक्षण, आश्वासन और समीक्षा की सुविधा—आखिर यह खेल कब तक चलेगा ?
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जलभराव अब कोई अप्रत्याशित घटना नहीं रह गई है। जिन स्थानों पर हर वर्ष पानी भरता है, वे प्रशासन के लिए अज्ञात नहीं हैं। फिर भी स्थायी समाधान क्यों नहीं? यदि समस्या चिन्हित है और पैसा भी खर्च हो रहा है, तो परिणाम कहां है?
काशी की जनता को भाषण नहीं, जल निकासी चाहिए
फोटो खिंचवाने वाली योजनाएं नहीं, जमीन पर काम चाहिए। उद्घाटन के पत्थर नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जो बारिश में भी शहर को चलने लायक रख सके।
धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी कहलाने वाली काशी में देश-दुनिया से श्रद्धालु आते हैं। ऐसे में जलमग्न सड़कें केवल स्थानीय परेशानी नहीं, बल्कि शहर की प्रतिष्ठा पर भी सवाल हैं। विकास की चमक अगर नालियों के पानी में अपना प्रतिबिंब खोजने लगे, तो समझना होगा कि कहीं न कहीं प्राथमिकताएं गड़बड़ा गई हैं।
जलभराव वाले हर इलाके की जवाबदेही तय हो। किस विभाग की जिम्मेदारी थी, कितना बजट खर्च हुआ, कौन-सा काम हुआ और उसका परिणाम क्या निकला—इन सवालों का सार्वजनिक हिसाब होना चाहिए।
काशी को विकास के विज्ञापन में नहीं, व्यवस्था की जमीन पर चमकना होगा।
क्योंकि सवाल सिर्फ पानी का नहीं है।
सवाल उस विकास मॉडल का है, जो बारिश की पहली परीक्षा में ही डूब जाता है।










