खाएंगे पैसा दिखाएंगे डंडा, अपने अधीनस्थ छोटे छोटे कर्मचारियों को
जन जन की आवाज कृष्णा पंडित की कलम ✍🏻
वाराणसी वसूली तंत्र की जकड़न में क्या कमिश्नर क्या दरोगा
ट्रैफिक पुलिस की वसूली के शोर से शहर घायल
वाराणसी, जिसे धर्म और संस्कृति की नगरी कहा जाता है, आज एक अलग ही कारण से चर्चा में है। आरोप हैं कि कमिश्नर से लेकर डीसीपी और थानों तक का तंत्र “वसूली” की संस्कृति में डूबा नजर आ रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या कानून का डंडा अब व्यवस्था बनाए रखने के लिए है या वसूली की ताकत दिखाने के लिए ?
शहर के व्यापारियों, छोटे दुकानदारों और आम नागरिकों के बीच यह चर्चा आम है कि बिना “सेटिंग” के कोई काम आगे नहीं बढ़ता
जांच, चालान, अनुमति—हर प्रक्रिया में नियमों से ज्यादा “रकम” की चर्चा होती है, जो दे देता है, उसका काम आसान
कमिश्नर कार्यालय से लेकर डीसीपी स्तर तक जवाबदेही तय करने की जरूरत है। यदि अधीनस्थ अधिकारी खुलेआम वसूली में मस्त हैं, तो क्या उच्च अधिकारी अनजान हैं? या फिर यह सब मौन स्वीकृति से चल रहा है? यह वही शहर है जहां कानून व्यवस्था की मिसाल दी जाती थी, लेकिन अब व्यवस्था पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे अधिक प्रभावित छोटे कारोबारी हैं। ठेला लगाने वाला, छोटी दुकान चलाने वाला या नया व्यापार शुरू करने वाला—हर कोई किसी न किसी “अनौपचारिक शुल्क” की मार झेल रहा है। डर का माहौल ऐसा कि शिकायत करने वाला खुद ही निशाने पर आ जाता है।
लोकतंत्र में प्रशासन जनता का सेवक होता है, मालिक नहीं
अगर डंडा केवल डराने और पैसा वसूलने का प्रतीक बन जाए, तो यह न केवल कानून की आत्मा के खिलाफ है, बल्कि शासन की साख पर भी सीधा आघात है !
जरूरत है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच हो। विजिलेंस और उच्च स्तर की मॉनिटरिंग से यह स्पष्ट किया जाए कि क्या वास्तव में वाराणसी में वसूली का संगठित तंत्र काम कर रहा है। अगर हां, तो जिम्मेदारी तय हो और सख्त कार्रवाई हो।
क्योंकि शहर पूछ रहा है—
कानून बिकेगा या न्याय जिंदा रहेगा?
हजारों गाड़ियां अवैध संचालित हो रही हैं, जो बिना परमिट और फिटनेस के संचालित हो रही हैं ! एक टी आई चार हमराही लेकर चल रहे हैं फिर भी कोई ऑटो सीज नहीं कर सकते सबका महीने का वसूली की सेटिंग है जिसकी जानकारी सभी अधिकारियों को है और ऊपर तक भी पहुंचता है ! चर्चा है की एक टी आई लाखों का महीना और बड़े साहेब तक पहुंचाने का है माध्यम खुलकर हो रही है दलाली है !
सबसे बड़ा सवाल यह है कि लहरतारा किरण पेट्रोल पंप और अंधरापुल माल गोदाम के पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां किस नियम के अंतर्गत खड़ी होती हैं क्या इनका परमिट है और खुले में कानून का मखौल क्यों पीछे सिर्फ वसूली तंत्र ही जिम्मेदार है ! यही नहीं कितने टी आई है जो हर महीने 100 से 200 गाड़ी सीज करते हैं लंका पर अवैध टैक्सी स्टैंड ,सामने घाट अवैध बस स्टैंड ,सामने घाट लंका टैक्सी स्टैंड,क्रूजर स्टैंड ,मैदागीन अवैध ऑटो स्टैंड और कितने भी अनैतिक धंधे द्वारा वसूली तंत्र का किस्सा है जो शहर वासियों के लिए जामतंत्र का कहर है !!










